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जानिए करवा चौथ 08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को क्यों और कैसे मनाएं (करवा चौथ 2017 का मुहूर्त)

प्रिय पाठकों /मित्रों , हमारे देश में हिन्दू पंचांगानुसार कार्तिक महीना में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत मनाया जाता है। इस वर्ष करवा चौथ का व्रत 08 अक्टूबर 2017 (रविवार) को मनाया जाएगा। करवा चौथ और संकष्टी चतुर्थी ये दोनों व्रत एक ही दिन मनाया जाता है। संकष्टी चतुर्थी गणेश जी को खुश करने के लिए किया जाता है। भारतीय हिन्दू पंचांगानुसार यह पर्व कार्तिक महीना की कृष्ण पक्ष की चौथी तिथि को मनाया जाता है। करवा चौथ को “करक चतुर्थी” भी कहा जाता है। करवा चौथ का व्रत विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु तथा प्रेम सम्बन्ध के स्थायित्व करने के लिए करती है। छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। 
जानिए करवा चौथ 08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को क्यों और कैसे मनाएं (करवा चौथ 2017 का मुहूर्त)-Know-why-Karwa-Chauth-is-celebrated-on-October-08-Sunday-2017         ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस दिन विवाहित स्त्रियां भगवान शिव जी, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं। अपने व्रत को चन्द्रमा को देखकर और अर्घ अर्पण करने के बाद अपने पति को जल पिलाती है तत्पश्चात अपना व्रत तोड़ती हैं।इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। करवा चौथ के व्रत का पूर्ण विवरण वामन पुराण में किया गया है।चाँद देखे बिना, यह माना जाता है कि व्रत अधूरा है और कोई महिला न कुछ भी खा सकती हैं और न पानी पी सकती हैं। करवा चौथ व्रत तभी पूरा माना जाता है जब महिला उगते हुये पूरे चाँद को छलनी में घी का दिया रखकर देखती है और चन्द्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथों से पानी पीती है। 
         करवा चौथ का व्रत कार्तिक हिन्दु माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। अमांत पञ्चाङ्ग जिसका अनुसरण गुजरात, महाराष्ट्र, और दक्षिणी भारत में किया जाता है, के अनुसार करवा चौथ अश्विन माह में पड़ता है। हालाँकि यह केवल माह का नाम है जो इसे अलग-अलग करता है और सभी राज्यों में करवा चौथ एक ही दिन मनाया जाता है। करवा चौथ व्रत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश में मनाया जाता है। ‘करवा चौथ’ अब केवल भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में रहने वाली भारतीय मूल की स्त्रियों द्वारा भी पूर्ण श्रद्धा से किया जाता है। करवा चौथ का दिन और संकष्टी चतुर्थी, जो कि भगवान गणेश के लिए उपवास करने का दिन होता है, एक ही समय होते हैं। विवाहित महिलाएँ पति की दीर्घ आयु के लिए करवा चौथ का व्रत और इसकी रस्मों को पूरी निष्ठा से करती हैं। विवाहित महिलाएँ भगवान शिव, माता पार्वती और कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान गणेश की पूजा करती हैं और अपने व्रत को चन्द्रमा के दर्शन और उनको अर्घ अर्पण करने के बाद ही तोड़ती हैं। 
       करवा चौथ का व्रत कठोर होता है और इसे अन्न और जल ग्रहण किये बिना ही सूर्योदय से रात में चन्द्रमा के दर्शन तक किया जाता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार करवा चौथ के दिन करवा वा करक का विशेष महत्त्व होता है। करवा अथवा करक का अर्थ होता है मिट्टी से बना हुआ पात्र। इस व्रत में चन्द्रमा को अर्घ्य (जल अर्पण) मिट्टी से बने हुए पात्र से ही देने का विधान है। इसी कारण इस पूजा में “करवा” का विशेष महत्त्व हो जाता है पूजा के बाद इस करवा को या तो अपने ही घर में संभालकर रखना चाहिए या किसी ब्राह्मण अथवा योग्य स्त्री को दान में दे देना चाहिए। दरअसल करवा चौथ मन के मिलन का पर्व है. इस पर्व पर महिलाएं दिनभर निर्जल उपवास रखती हैं और चंद्रोदय में गणेश जी की पूजा-अर्चना के बाद अर्घ्य देकर व्रत तोड़ती हैं। व्रत तोड़ने से पूर्व चलनी में दीपक रखकर, उसकी ओट से पति की छवि को निहारने की परंपरा भी करवा चौथ पर्व की है। । इस दिन बहुएं अपनी सास को चीनी के करवे, साड़ी व श्रृंगार सामग्री प्रदान करती हैं। पति की ओर से पत्‍‌नी को तोहफा देने का चलन भी इस त्यौहार में है।
         कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को जो उपवास किया जाता है उसका सुहागिन स्त्रियों के लिये बहुत अधिक महत्व होता है। दरअसल इस दिन को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन यदि सुहागिन स्त्रियां उपवास रखें तो उनके पति की उम्र लंबी होती है और उनका गृहस्थ जीवन सुखद होने लगता है। हालांकि पूरे भारतवर्ष में हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले लोग बड़ी धूम-धाम से इस त्यौहार को मनाते हैं लेकिन उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि में तो इस दिन अलग ही नजारा होता है। करवाचौथ व्रत के दिन एक और जहां दिन में कथाओं का दौर चलता है तो दूसरी और दिन ढलते ही विवाहिताओं की नज़रें चांद के दिदार के लिये बेताब हो जाती हैं। चांद निकलने पर घरों की छतों का नजारा भी देखने लायक होता है।
      दरअसल सारा दिन पति की लंबी उम्र के लिये उपवास रखने के बाद आसमान के चमकते चांद का दिदार कर अपने चांद के हाथों से निवाला खाकर अपना उपवास खोलती हैं। करवाचौथ का व्रत सुबह सूर्योदय से पहले ही 4 बजे के बाद शुरु हो जाता है और रात को चंद्रदर्शन के बाद ही व्रत को खोला जाता है। इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है और करवाचौथ व्रत की कथा सुनी जाती है। सामान्यत: विवाहोपरांत 12 या 16 साल तक लगातार इस उपवास को किया जाता है लेकिन इच्छानुसार जीवनभर भी विवाहिताएं इस व्रत को रख सकती हैं। माना जाता है कि अपने पति की लंबी उम्र के लिये इससे श्रेष्ठ कोई उपवास अतवा व्रतादि नहीं है। 
करवा चौथ व्रत की पूजन सामग्री---- 
 कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें। व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। 
       इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। 
शिव-पार्वती की पूजा का विधान---
 ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की करवा चौथ व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनकर श्रृंगार कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। 
          व्रत के दिन प्रातरू स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- 'मम सुख सौभाग्य पुत्र-पौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।' पूरे दिन निर्जला रहें। दीवार पर गेरू से फलक बनाकर पिसे चावलों के घोल से करवा मांडें। इसे 'वर' कहते हैं। चित्रित करने की कला को 'करवा धरना' कहा जाता है। 8 पूरियों की अठावरी बनाएं। हलुआ बनाएं। पक्के पकवान बनाएं। पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं। गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें। जल से भरा हुआ लोटा रखें। वायना (भेंट) देने के लिए मिट्टी का टोंटीदार करवा लें। करवा में गेहूं और ढक्कन में शकर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें। रोली से करवे पर स्वस्तिक बनाएं। गौरी-गणेश और चित्रित करवे की परंपरानुसार पूजा करें।  पति की दीर्घायु की कामना कर पढ़ें यह मंत्र : - 
 'नमस्त्यै शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभा। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे।'
 करवे पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें। कथा सुनने के बाद करवे पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें। 13 दाने गेहूं के और पानी का लोटा या टोंटीदार करवा अलग रख लें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें। इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें। पूजन के पश्चात आस-पड़ोस की महिलाओं को करवा चौथ की बधाई देकर पर्व को संपन्न करें।
जानिए क्या रखें करवा चौथ व्रत में सावधानियां --
  1. केवल सुहागिनें या जिनका रिश्ता तय हो गया हो वही स्त्रियां ये व्रत रख सकती हैं।
  2. व्रत रखने वाली स्त्री को काले और सफेद कपड़े कतई नहीं पहनने चाहिए। 
  3. करवा चौथ के दिन लाल और पीले कपड़े पहनना विशेष फलदायी होता है। 
  4. करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है। 
  5. ये व्रत निर्जल या केवल जल ग्रहण करके ही रखना चाहिए। 
  6. इस दिन पूर्ण श्रृंगार और अच्छा भोजन करना चाहिए।
  7. पत्नी के अस्वस्थ होने की स्थिति में पति भी ये व्रत रख सकते हैं।

 यह हैं करवा चौथ पूजन विधि---- 
 नारद पुराण के अनुसार इस दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। करवा चौथ की पूजा करने के लिए बालू या सफेद मिट्टी की एक वेदी बनाकर भगवान शिव- देवी पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, चंद्रमा एवं गणेशजी को स्थापित कर उनकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें। 
पूजन के समय निम्न मन्त्र- 
’’मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये। 
सांयकाल के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए। मां पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें। भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और करवे में पानी भरकर पूजा करें। सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन र्निजला व्रत रखकर कथा का श्रवण करें। तत्पश्चात चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें। 
करवा चौथ पूजन विधि--- 
प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें। व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें। व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है- 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।' घर के मंदिर की दीवार पर गेरू से फलक बनाकर चावलों को पीसे। फिर इस घोल से करवा चित्रित करें। इस रीती को करवा धरना कहा जाता है। शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाए।
     माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें। भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। सायं काल में चंद्रमा के दर्शन करने के बाद ही पति द्वारा अन्न एवं जल ग्रहण करें। पति, सास-ससुर सब का आशीर्वाद लेकर व्रत को समाप्त करें। पूजा के बाद करवा चौथ की कथा सुननी चाहिए तथा चंद्रमा को अर्घ्य देकर छलनी से अपने पति को देखना चाहिए। पति के हाथों से ही पानी पीकर व्रत खोलना चाहिए। इस प्रकार व्रत को सोलह या बारह वर्षों तक करके उद्यापन कर देना चाहिए। पूजा की कुछ अन्य रस्मों में सास को बायना देना, मां गौरी को श्रृंगार का सामान अर्पित करना आदि शामिल है।
करवा चौथ का महत्त्व -- 
 करवा चौथ की अन्य कई कहानियां भी प्रचलित हैं किन्तु इस कथा का जिक्र शास्त्रों में होने के कारण इसका आज भी महत्त्व बना हुआ है। द्रोपदी द्वारा शुरू किए गए करवा चौथ व्रत की आज भी वही मान्यता है। द्रौपदी ने अपने सुहाग की लंबी आयु के लिए यह व्रत रखा था और निर्जल रहीं थीं। यह माना जाता है कि पांडवों की विजय में द्रौपदी के इस व्रत का भी महत्व था। महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। 
     वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।
जानिए करवा चौथ की प्रचलित व्रत कथा--- 
 एक समय की बात है, सात भाइयों की एक बहन का विवाह एक राजा से हुआ। विवाहोपरांत जब पहला करवा चौथ आया, तो रानी अपने मायके आ गयी। रीति-रिवाज अनुसार उसने करवा चौथ का व्रत तो रखा किन्तु अधिक समय तक व भूख-प्यास सहन नहीं कर पर रही थी और चाँद दिखने की प्रतीक्षा में बैठी रही। उसका यह हाल उन सातों भाइयों से ना देखा गया, अतः उन्होंने बहन की पीड़ा कम करने हेतु एक पीपल के पेड़ के पीछे एक दर्पण से नकली चाँद की छाया दिखा दी। बहन को लगा कि असली चाँद दिखाई दे गया और उसने अपना व्रत समाप्त कर लिया। 
      इधर रानी ने व्रत समाप्त किया उधर उसके पति का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। यह समाचार सुनते ही वह तुरंत अपने ससुराल को रवाना हो गयी। रास्ते में रानी की भेंट शिव-पार्वती से हुईं। माँ पार्वती ने उसे बताया कि उसके पति की मृत्यु हो चुकी है और इसका कारण वह खुद है। रानी को पहले तो कुछ भी समझ ना आया किन्तु जब उसे पूरी बात का पता चला तो उसने माँ पार्वती से अपने भाइयों की भूल के लिए क्षमा याचना की। यह देख माँ पार्वती ने रानी से कहा कि उसका पति पुनः जीवित हो सकता है यदि वह सम्पूर्ण विधि-विधान से पुनः करवा चौथ का व्रत करें। तत्पश्चात देवी माँ ने रानी को व्रत की पूरी विधि बताई। माँ की बताई विधि का पालन कर रानी ने करवा चौथ का व्रत संपन्न किया और अपने पति की पुनः प्राप्ति की। 
           पौराणिक मान्यताओं के अनुसार करवा चौथ के दिन शाम के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है। इस दिन बिना चन्द्रमा को अर्घ्य दिए व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। करवा चौथ मूर्हूत पंचांग आधारित वह सटीक समय होता है जिसकेअंदर/उसी समयावधि में ही पूजा करनी होती है। 
वर्ष 2017 में पूजा और चन्द्रमा निकलने का समय निम्न है: --- 
  •  08 अक्टूबर, (रविवार) 2017 को करवा चौथ चंद्र दर्शन समय – 20:14 मिनट रात्रि पर 
  •  करवा चौथ पूजा महूर्त – 17:55 से 19: 09 तक, (दिल्ली का समय) 
  • करवा चौथ तिथि : 08 अक्टूबर 2017, रविवार 
  • करवा चौथ पूजा शुभ मुहूर्त : 17:55 से 19:09 
  • चंद्रोदय समय : रात्रि 20:14 बजे 
  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ : 16:58 (8 अक्तूबर 2017) 
  • चतुर्थी तिथि समाप्त : 14:16 (9 अक्तूबर 2017)

उज्जैन (मध्यप्रदेश ) में करवा चौथ पूजन का शुभ मुहूर्त-- 
  • करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय होगा 
  • करवा चौथ पूजा मुहूर्त = १८:२४ से १९:४१ अवधि = १ घण्टा १७ मिनट्स 
  • करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय = २०:४७ 
  • चतुर्थी तिथि प्रारम्भ = ८/अक्टूबर/२०१७ को ०७:२८ बजे 
  • चतुर्थी तिथि समाप्त = ९/अक्टूबर/२०१७ को ०४:४६ बजे

इस शारदीय नवरात्रि में पूजाघर/ घर के मंदिर भूलकर भी नहीं करें ये गलतियां वरना हो सकता हैं तनाव/टेंशन

प्रिय पाठकों/मित्रों, भगवान् की पूजा हर घर में की जाती है, लोग अपने घर में भगवान् को एक खास जगह देते है और उसी जगह पर रोज़ाना उनकी पूजा पाठ की जाती है,एक तरह से माना जाये तो ये स्थान हमारे घर में एक मंदिर के रूप में रहता है.मंदिर चाहे छोटा हो या बड़ा लेकिन उसका वास्तु के अनुसार ही होना शुभ माना जाता है. आज हम आपको आपके घर के मंदिर से जुड़ी ऐसी ज़रूरी बातो के बारे में बताने जा रहे है जिनका ध्यान रखना बहुत ही जरूरी होता है. अगर आप इन बातो का ध्यान नहीं रखते है तो इससे भगवान की कृपा घर-परिवार को नहीं मिल पाती है |
इस शारदीय नवरात्रि में पूजाघर/ घर के मंदिर भूलकर भी नहीं करें ये गलतियां वरना हो सकता हैं तनाव/टेंशन-Do-not-even-forget-the-house-in-this-monastery-Navaratri-These-mistakes-may-be-tension       घर के मंदिर में भगवान की मूर्तियां रखकर पूजा अर्चना करने की परंपरा सदियों पुरानी है। लेकिन वास्तु शास्‍त्र के अनुसार कुछ ऐसे देवी-देवताओं की मूर्त‌ियां भी हैं जिन्हें घर के मंद‌िर में नहीं रखना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इनके घर में होने पर सुख समृद्ध‌ि घर से चली जाती है। वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि आपके घर का पूजाघर गलत दिशा में बना हुआ हैं तो पूजा का अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता हैं फिर भी ऐसे पूजाघर में उत्तर अथवा पूर्वोत्तर दिशा में भगवान की मूर्तियाॅ या चित्र आदि रखने चाहिए । पूजाघर की देहरी को कुछ ऊँचा बनाना चाहिए । पूजाघर में प्रातःकाल सूर्य का प्रकाश आने की व्यवस्था बनानी चाहिए । पूजाघर में वायु के प्रवाह को संतुलित बनाने के लिए कोई खिड़की अथवा रोशनदान भी होनी चाहिए । पूजाघर के द्वार पर मांगलिक चि
न्ह, (स्वास्तीक, ऊँ,) आदि स्थापित करने चाहिए ।
      ब्रह्मा, विष्णु, महेश या सूर्य की मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम में होना चाहिए । गणपति एवं दुर्गा की मूर्तियों का मुख दक्षिण में होना उत्तम होता हैं । काली माॅ की मूर्ति का मुख दक्षिण में होना शुभ माना गया हैं । हनुमान जी की मूर्ति का मुख दक्षिण पश्चिम में होना शुभ फलदायक हैं । पूजा घर में श्रीयंत्र, गणेश यंत्र या कुबेर यंत्र रखना शुभ हैं । पूजाघर के समीप शौचालय नहीं होना चाहिए । इससे प्रबल वास्तुदोष उत्पन्न होता हैं । यदि पूजाघर के नजदीक शौचालय हो, तो शौचालय का द्वार इस प्रकार बनाना चाहिए कि पूजाकक्ष के द्वार से अथवा पूजाकक्ष में बैठकर वह दिखाई न दे । 
      पूजाघर का दरवाजा लम्बे समय तक बंद नहीं रखना चाहिए । यदि पूजाघर में नियमित रूप से पूजा नहीं की जाए तो वहाॅ के निवासियों को दोषकारक परिणाम प्राप्त होते हैं । पूजाघर में गंदगी एवं आसपास के वातावरण में शौरगुल हो तो ऐसा पूजाकक्ष भी दोषयुक्त होता हैं चाहे वह वास्तुसम्मत ही क्यों न बना हो क्योंकि ऐसे स्थान पर आकाश तत्व एवं वायु तत्व प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण इस पूजा कक्ष में बैठकर पूजन करने वाले व्यक्तियों की एकाग्रता भंग होती हैं तथा पूजा का शुभ फला प्राप्त नहीं होता । पूजा घर गलत दिशा में बना हुआ होने पर भी यदि वहां का वातावरण स्वच्छ एवं शांतिपूर्ण होगा तो उस स्थान का वास्तुदोष प्रभाव स्वयं ही घट जाएगा ।
       भगवान के दर्शन मात्र से ही कई जन्मों के पापों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। इसी वजह से घर में भी देवी-देवताओं की मूर्तियां रखने की परंपरा है। इस कारण घर में छोटा मंदिर होता है और उस मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं रखी जाती हैं। कुछ लोग एक ही देवता की कई मूर्तियां भी रखते हैं। हमारे वैदिक शास्त्रों में बताया गया है कि घर के मंदिर में किस देवता की कितनी मूर्तियां रखना श्रेष्ठ है।
 भगवान् श्रीगणेश की मूर्ति---- 
प्रथम पूज्य श्रीगणेश के स्मरण मात्र लेने से ही कार्य सिद्ध हो जाते हैं। घर में इनकी मूर्ति रखना बहुत शुभ माना जाता है। वैसे तो अधिकांश घरों में गणेशजी की कई मूर्तियां होती हैं, लेकिन ध्यान रखें कि गजानंद की मूर्तियों की संख्या 1, 3 या 5 नहीं होना चाहिए। यह अशुभ माना गया है। गणेशजी की मूर्तियों की संख्या विषम नहीं होना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार श्रीगणेश का स्वरूप सम संख्या के समान होता है, इस कारण इनकी मूर्तियों की संख्या विषम नहीं होना चाहिए। विषम संख्या यानी 1, 3, 5 आदि। घर में श्रीगणेश की कम से कम दो मूर्तियां रखना श्रेष्ठ माना गया है।
 शिवलिंग की संख्या और आकार--- 
ऐसा माना जाता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। घर में शिवलिंग रखने के संबंध में कुछ नियम बताए गए हैं। घर के मंदिर में रखे गए शिवलिंग का आकार हमारे अंगूठे से बड़ा नहीं होना चाहिए। ऐसा माना जाता है शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है, अत: घर में ज्यादा बड़ा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। इसके साथ ही घर के मंदिर में एक शिवलिंग ही रखा जाए तो वह ज्यादा बेहतर फल देता है। एक से अधिक शिवलिंग रखने से बचना चाहिए।
 हनुमानजी की मूर्तियां--- 
घर के मंदिर में हनुमानजी की मूर्ति की संख्या एक ही होनी चाहिए, क्योंकि बजरंग बली रुद्र (शिव) के अवतार हैं। घर में शिवलिंग भी एक ही होना चाहिए। मंदिर में बैठे हुए हनुमानजी की प्रतिमा रखना श्रेष्ठ होता है। घर के अन्य भाग में हनुमानजी की मूर्ति नहीं, ऐसी फोटो रखी जा सकती है, जिसमें वे खड़े हुए हों। घर के दरवाजे के पास उड़ते हुए हनुमानजी की फोटो रखी जा सकती है। ध्यान रखें पति-पत्नी को शयनकक्ष में हनुमानजी की मूर्ति या फोटो नहीं लगाना चाहिए। शयनकक्ष में राधा-कृष्ण का फोटो लगाया जा सकता है। 
 मां दुर्गा और अन्य देवियों की मूर्तियों की संख्या---- 
घर के मंदिर मां दुर्गा या अन्य किसी देवी की मूर्तियों की संख्या तीन नहीं होना चाहिए। यह अशुभ माना जाता है। यदि आप चाहें तो तीन से कम या ज्यादा मूर्तियां घर के मंदिर में रख सकते हैं। मूर्तियों के संबंध में श्रेष्ठ बात यही है कि मंदिर में किसी भी देवता की एक से अधिक मूर्तियां न हो। अलग-अलग देवी-देवताओं की एक-एक मूर्तियां रखी जा सकती है। 
आइये पंडित दयानन्द शास्त्री से जानते है घर-परिवार में खुशियां और शांति बनाएं रखने के लिए कुछ टिप्स/टोटके/उपाय---
  1. आपके घर के मंदिर के आसपास बाथरूम का होना अच्छा नहीं माना जाता है,इसके अलावा मंदिर को कभी किचन में भी नहीं बनवाना चाहिए,वास्तु के हिसाब से ये अच्छा नहीं माना जाता है. 
  2.  मंदिर को कभी भी अपने घर की दक्षिण और पश्चिम दिशा में ना बनवाये. ऐसा होने से परिवार के सदस्यों पर बहुत बुरा असर पड़ता है. मंदिर को हमेशा घर की पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए,ऐसा करने से घर में हमेशा सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है. 
  3. इस बात का हमेशा ध्यान रखे की आप अपने घर के मंदिर में भगवान की जिन मूर्तियों को रखते है उनमे हमेशा एक इंच का फासला ज़रूर होना चाहिए, इसके अलावा भगवान को कभी भी आमने सामने नहीं रखना चाहिए. ऐसा होने से आपके जीवन में तनाव हो सकता है. 
  4.  वास्तु विज्ञान के मुताबिक भगवान भैरव की मूर्ति घर में नहीं रखनी चाह‌िए। वैसे तो भैरव, भगवान श‌िव का ही एक रूप हैं। लेकिन भैरव, तामस‌िक देवता हैं। तंत्र मंत्र द्वारा इनकी साधना की जाती है। इसल‌िए घर में भैरव की मूर्त‌ि नहीं रखनी चाह‌िए। 
  5. भगवान श‌िव का एक और रूप है- नटराज। वास्तु शास्त्र के अनुसार नटराज रूप वाली भगवान श‌िव की प्रत‌िमा भी घर में नहीं होनी चाह‌िए। इसका कारण यह है क‌ि नटराज रूप में श‌िव, तांडव करते हैं इसल‌िए इन्हें घर में न लाएं। 
  6. ग्रह शांति के लिए शनि की पूजा अर्चना तो की जाती है लेकिन ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक शनि की मूर्ति घर नहीं लानी चाहिए। शनि की ही तरह, ज्योत‌िषशास्‍त्र में राहु-केतु की भी पूजा की सलाह तो दी जाती है, लेक‌िन इनकी मूर्त‌ि घर लाने से मना किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंक‌ि राहु-केतु, दोनों छाया ग्रह होने के साथ ही पाप ग्रह भी है। 
  7. वास्तु शास्त्र के मुताबिक घर के मंदिर में भगवान की सिर्फ सौम्य रूप वाली मूर्त‌ियां ही होनी चाह‌िए। ऐसे में मां दुर्गा के कालरात्र‌ि स्वरूप वाली मूर्त‌ि भी घर में नहीं रखनी चाहिए। 

जानिए कुछ अतिरिक्त विशेष सावधानियां--- 
  1. किसी भी प्रकार के पूजन में कुल देवता, कुल देवी, घर के वास्तु देवता, ग्राम देवता आदि का ध्यान करना भी आवश्यक है। इन सभी का पूजन भी करना चाहिए। 
  2. पूजन में हम जिस आसन पर बैठते हैं, उसे पैरों से इधर-उधर खिसकाना नहीं चाहिए। आसन को हाथों से ही खिसकाना चाहिए।
  3. देवी-देवताओं को हार-फूल, पत्तियां आदि अर्पित करने से पहले एक बार साफ पानी से अवश्य धो लेना चाहिए। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए पीले रंग का रेशमी कपड़ा चढ़ाना चाहिए। माता दुर्गा, सूर्यदेव व श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए लाल रंग का, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सफेद वस्त्र अर्पित करना चाहिए। 
  4. पूजन कर्म में इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पूजा के बीच में दीपक बुझना नहीं चाहिए। ऐसा होने पर पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। 
  5. यदि आप प्रतिदिन घी का एक दीपक भी घर में जलाएंगे तो घर के कई वास्तु दोष भी दूर हो जाएंगे। 
  6. सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु, ये पंचदेव कहलाते हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। प्रतिदिन पूजन करते समय इन पंचदेव का ध्यान करना चाहिए। इससे लक्ष्मी कृपा और समृद्धि प्राप्त होती है 
  7. तुलसी के पत्तों को 11 दिनों तक बासी नहीं माना जाता है। इसकी पत्तियों पर हर रोज जल छिड़कर पुन: भगवान को अर्पित किया जा सकता है। 
  8. दीपक हमेशा भगवान की प्रतिमा के ठीक सामने लगाना चाहिए। कभी-कभी भगवान की प्रतिमा के सामने दीपक न लगाकर इधर-उधर लगा दिया जाता है, जबकि यह सही नहीं है। 
  9. घी के दीपक के लिए सफेद रुई की बत्ती उपयोग किया जाना चाहिए। जबकि तेल के दीपक के लिए लाल धागे की बत्ती श्रेष्ठ बताई गई है। 
  10. पूजन में कभी भी खंडित दीपक नहीं जलाना चाहिए। धार्मिक कार्यों में खंडित सामग्री शुभ नहीं मानी जाती है।
  11. शिवजी को बिल्व पत्र अवश्य चढ़ाएं और किसी भी पूजा में मनोकामना की सफलता के लिए अपनी इच्छा के अनुसार भगवान को दक्षिणा अवश्य चढ़ानी चाहिए, दान करना चाहिए। दक्षिणा अर्पित करते समय अपने दोषों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। दोषों को जल्दी से जल्दी छोड़ने पर मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी। --
  12. भगवान सूर्य की 7, श्रीगणेश की 3, विष्णुजी की 4 और शिवजी की 1/2 परिक्रमा करनी चाहिए। 
  13. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए। इन सभी की पूरी जानकारी किसी ब्राह्मण (पंडित) से प्राप्त की जा सकती है। विशेष पूजन पंडित की मदद से ही करवाने चाहिए, ताकि पूजा विधिवत हो सके।
  14. घर में पूजन स्थल के ऊपर कोई कबाड़ या भारी चीज न रखें। 
  15. भगवान शिव को हल्दी नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही शंख से जल चढ़ाना चाहिए। 
  16. पूजन स्थल पर पवित्रता का ध्यान रखें। चप्पल पहनकर कोई मंदिर तक नहीं जाना चाहिए। चमड़े का बेल्ट या पर्स अपने पास रखकर पूजा न करें। पूजन स्थल पर कचरा इत्यादि न जमा हो पाए। 
  17. किसी भी भगवान के पूजन में उनका आवाहन (आमंत्रित करना) करना, ध्यान करना, आसन देना, स्नान करवाना, धूप-दीप जलाना, अक्षत (चावल), कुमकुम, चंदन, पुष्प (फूल), प्रसाद आदि अनिवार्य रूप से होना चाहिए। 
  18. सभी प्रकार की पूजा में चावल विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं। पूजन के लिए ऐसे चावल का उपयोग करना चाहिए जो अखंडित (पूरे चावल) हो यानी टूटे हुए ना हो। चावल चढ़ाने से पहले इन्हें हल्दी से पीला करना बहुत शुभ माना गया है। इसके लिए थोड़े से पानी में हल्दी घोल लें और उस घोल में चावल को डूबोकर पीला किया जा सकता है। 
  19.  पूजन में पान का पत्ता भी रखना चाहिए। ध्यान रखें पान के पत्ते के साथ इलाइची, लौंग, गुलकंद आदि भी चढ़ाना चाहिए। पूरा बना हुआ पान चढ़ाएंगे तो श्रेष्ठ रहेगा। 

घर के मंदिर का बल्ब देता हें नुकसान/हानि—
 आजकल बहुत से लोग घरों या दुकानों में छोटा-सा मंदिर बनाकर उसमें गणेश जी या लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर देते हैं, वहां घी का दीपक जलाने की बजाय बिजली का बल्व लगा देते हैं। यदि आपने भी गणेश जी के स्थान में बिजली का लाल बल्ब जला रखा है तो इसे उतार दें। यह शुभदायक नहीं है, इससे आपके खाते में हानि के लाल अंक ही आएंगे। अतः घर के मंदिर में कभी भी बिजली के बल्व का इस्तेमाल न करें। कहते मंदिर जाने से मन को शांति मिलती है। 
    मंदिर वो स्थान है जहां से व्यक्ति को आत्मिक शांति के साथ ही सुख-समृद्धि भी मिलती है। लेकिन वास्तु के अनुसार घर के आसपास मंदिर का होना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे मंदिर आपका घर बिगाड़ सकते हैं। आपको ऐसे मंदिरों में नहीं जाना चाहिए जो आपके घर के पास है। अगर आप ऐसे मंदिरों में पूजा करते हैं तो उन मंदिरों के प्रभाव से आपका घर बिगड़ सकता है। आपकी पूजा पाठ का अशुभ फल आपके घर पडऩे लगता है।

जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)

रूद्राक्ष (रूद्र मतलब शिव, अक्ष मतलब आंसु इसलिए रूद्र अधिक अक्ष मतलब शिव के आंसु) विज्ञान में उसे म्संमवबंतचने ळंदपजतें त्वगइ के नाम से जाना जाता हैं, जो एक तरह का (फल) बीज हैं । जो कि एशिया खंड के कुछ भागों में जैसे की इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, भारत, नेपाल, श्रीलंका और अंदमान-निकोबार में पाये जाते हैं । कई वैज्ञानिको ने अपने लंबे प्रयोगात्मक अभ्यास के बाद कबूल किया हैं कि इस चमत्कारी बीज के कई फायदे हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिव, अध्यात्मिक और कई वैद्यकीय खूबीयां हैं जो इसके पहनने वाले को जीवन के कई कार्यक्षेत्र (जैसे की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) में मदद रूप होता हैं । कई पुराण, शास्त्रों और आयुर्वेदिय शास्त्रों में रूद्राक्ष के फायदे और महत्ता का तलस्पर्शीय वर्णन किया गया हैं । आज कई हजार सालो से राजा, साधु-संत और ऋषिमुनि रूद्राक्ष की पूजा करते आ रहे हैं और उसे पहनते आये हैं । 
जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)-Learn-how-to-use-Rudraksh-to-remove-his-disease-Rudraksh-treatment-of-various-diseases--       कहते हैं रूद्राक्ष पहनने वाले को अध्यात्मिक रूप में कई फायदे होते हैं, उससे संपत्ति और ख्याति भी बढ़ती हें ओर कई भौतिक सुख भी प्राप्त होते हैं । रूद्राक्ष या रूद्राक्षमाला पहनने से पहले जरूरी हैं कि किसी रूद्राक्ष थेयायिस्ट, ज्योतिषि, वैदिक अभ्यासु, आयुर्वेदिक डॉक्टर या फिर किसी ऐसे व्यक्ति जिसने रूद्राक्ष धारण किया हो । उनसे उनके अनुभवों को जान लेना जरूरी हैं ताकि रूद्राक्ष से होने वाले फायदों ाक रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति पूरी तरह लाभ उठा सके । रूद्राक्ष के दर्शन से लक्ष पुण्य, स्पर्श से कोटि-प्रमाण पुण्य, धारण करने से दशकोटि-प्रमाण पुण्य एवं इससे जप करने से लक्ष कोटि सहस्त्र तथा लक्ष कोटि शत-प्रमाण पुण्य की प्राप्ति होती हैं। श्री मद्देवीभागवत के अनुसार जिस प्रकार पुरूषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, मुनियों में कश्यप, अश्व समूहों में उच्चैः श्रवा, देवों में शिव देवियों में गौरी (पार्वती) सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह रूद्राक्ष सभी में श्रेष्ठ हैं।  
रूद्राक्ष उत्पत्ति की कथा :- 
 स्कन्ध पुराण के अनुसार प्राचीन समय में पाताल लोक का राजा मय बड़ा ही बलशाली, शुरवीर, महापराक्रमी और अजय राजा था । एक बार उसके मन में लौभ आया और पाताल से निकलकर अन्य लोको पर विजय प्राप्त की जाए एैसा मन में विचार किया । विचार के अनुसार पाताल लोक के दानवों ने अन्य लोकों के ऊपर आक्रमण कर दिया और अपने बल के मद में चुर मय ने हिमालय पर्वत के तीनों श्रृंगों पर तीन पूल बनाए । जिनमें से एक सोने का, एक चॉदी का और एक लोहे का था । इस प्रकार सभी देवताओं के स्थान पर पाताल लोक के लोगों का वहां राज्य हो गया । 
       सभी देवतागण इधन-उधर गुफा आदि में छुपकर अपना जीवन व्यतित करने लगे । अन्त में सभी देवतागण ब्रह्माजी के पास गये और उनसे प्रार्थना की कि पाताल लोक के महापराक्रमी त्रिपुरासुरों से हमारी रक्षा करें । तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि त्रिपुरासुर इस समय महापराक्रमी हैं । समय और भाग्य उसका साथ दे रहा हैं । अतः हम सभी को त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु की शरण में चलना चाहिए । हमारा मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा । इस प्रकार ब्रह्माजी सहित समस्त देवगण विष्णु लोक पहुॅचकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगें । देवगणों ने अपनी करूण कथा भगवान विष्णु को सुनाई और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की । भगवान विष्णु ने भी ब्रह्माजी की तरह भगवान शिव की शरण में जाने को कहा । तत्प्श्चात सभी देवगण भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुॅचे वहां उन्होने प्रभु से शरण मांगी और अपने जीवन की रक्षा हेतु प्रार्थना की । 
     तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा आदि सहित सभी देवतागण व स्वयं भगवान शिव पृथ्वी मंडल पर रथ को लेकर, तथा अपना धनुष बाण लेकर और स्वयं भगवान विष्णु दिव्य बाण बनकर भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए । इस प्रकार भगवान शिव ने सागर स्वरूप तूणिर को बांध युद्ध के लिए रवाना हुए । त्रिपुरासुरों के नगर में पहुॅचकर भगवान शिव ने शुलमणी भगवान नारायण स्वरूप धारण कर अमोघ बाण को धनुष में चढ़ाकर निशाना साधते हुए त्रिपुरासुर पर प्रहार किया जिससे त्रिपुरासुरों के तीनों त्रिपुर के जलते ही हाहाकार मच गई । त्रिपुर के दाह के समय भगवान शिव ने अपने रोद्र शरीर को धारण कर लिया और अपनी युद्ध की थकान मिटाने हेतु सुन्दर शिखर पर विश्राम करने हेतु पहुॅचे । विश्राम के बाद भगवान शिव जोर-जोर से हंसने लगे । भगवान रूद्र के नेत्रों से चार ऑसु टपक पड़े। उन्हीं चार बूंद अश्रुओं के उस शेल शिखर पर गिर जाने से चार अंकुर पैदा हुए । समयानुसार अंकुर बड़े होने से कोई पत्र, पुष्प व फल आदि से हरे-भरे हो गये और रूद्र के अश्रुकणों से उत्पन्न ये वृक्ष रूद्राक्ष नाम से विख्यात हुए । 
 जानिए रूद्राक्ष और रूद्राक्ष माला पहनने के फायदे--- 
 1 रूद्राक्ष अथवा रूद्राक्षमाला मनकी चंचलता दूर करता हैं, शांति देता हैं, बेचैनी दूर करता हैं, आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बढ़ाता हैं । 
 2 रूद्राक्ष में कई प्रकार के विटामिन हेते हैं जैसे कि विटामिन सी, जो रोगो से लड़ने वाली हमारे शरीर की प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाता हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिक तरंगे होती हैं, जो हमारे रूधिराभिसरण और रक्तचाप को काबू में रखता हैं । 
 3 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला की पूजा करने वाले और धारण करने वाले को रूद्राक्ष कालाजादू, मारण तंत्र, और बुरी आत्माओं से सुरक्षा प्रदान करता हैं । 
 4 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला पहननेवाले को रूद्राक्ष अकस्मात और अकुदरती मौत से बचाता हैं । 
 5 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला हमारे अंदर की विषयवासना, लालच, क्रोध और अहंकार को दूर करता हैं, और हृदय को शुद्ध करता हैं । 
 6 मंत्र सिद्धि में रूद्राक्षमाला इन्सान की अंतरज्ञान शक्ति तथा अति इंद्रिय शक्ति को बढ़ाता हैं। सही नियमों का पालन करके किसी खास हेतु से पहना गया रूद्राक्ष इच्छित वस्तु या लक्ष्य पाने में काफी मदद करता हैं । 
===================================================================== आइये जाने विभिन्न रुद्राक्ष और उनके औषधीय गुण--- 
 एकमुखी रूद्राक्ष :- एकमुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव-स्वरूप हैं, इसके धारण करने से बड़े से बड़े पापों का नाश होता हैं, मनुष्य चिंतामुक्त और निर्भय हो जाता हैं, उसे किसी भी प्रकार की अन्य शक्ति और शत्रु से कोई कष्ट भय नहीं होता जो एकमुखी रूद्राक्ष को धारण और पूजन करता हैं, उसके यहॉ लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, स्थिर हो जाती हैं । रूद्राक्षों में एकमुखी रूद्राक्ष सर्वश्रेष्ठ, शिव स्वरूप सर्वकामना सिद्धि-फलदायक और मोक्षदाता हैं। एकमुखी रूद्राक्ष से संसार के सभी सुख सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं । अपने प्रभाव से यह रूद्राक्ष कंगाल को राजा बना सकता हैं ।
       सच्चा एकमुखी रूद्राक्ष किसी भी असम्भव कार्य को सम्भव कर सकता हैं किन्तु यह बात आमतौर पर बाजार में मिलने वाले एक मुखी काजु दाना (भद्राक्ष) पर लागु नहीं होती हैं । सूर्य दक्षिण-नेत्र, हृदय, मस्तिष्क, अस्थि इत्यादि का कारक हैं। यह ग्रह भगन्दर, स्नायु रोग, अतिसार, अग्निमंदता इत्यादि रोगों का भी कारक बनता हैं, जब यह प्रतिकूल बन जाता हैं, तब यह विटामिन ए और विटामिन डी को भी संचालित करता है, जिसकी कमी से निशान्धता (रात में न दिखाई देना), हड्डीयों की कमजोरी जैसे रोग उत्पन्न हाते हैं । इन सब के निवारण के लिए एकमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए क्योकिं सूर्यजनित दोषों के निवारण हेतु ज्योतिषी माणिक्य रत्न धारण करने का परामर्श देते हैं । सूर्य प्रतिकूल-स्थानीय होकर विभिन्न रोगों को जन्म देते हैं । नेत्र सम्बन्धी रोग, सिरदर्द, हृदयरोग, हड्डी के रोग, त्वचा रोग, उदर सम्बन्धी रोग, तेज बुखार, जैसे सभी रोगो के निवारण हेतु रूद्राक्ष माला के मध्य में एकमुखी रूद्राक्ष को पिरोकर धारण करना चाहिए। 
 दोमुखी रूद्राक्ष :-  दोमुखी रूद्राक्ष हर गौरी (अर्धनारीश्वर) स्वरूप हैं, इसे शिव-शिवा-रूप भी कहते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित (धारण) होता हैं, उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि ईधन को जला डालती हैं । इस रूद्राक्ष का संचालन ग्रह चन्द्रमा (सोम) हैं । यह रूद्राक्ष हर प्रकार के रिश्तों में एकता बढ़ाता हैं, वशीकरण मानसिक शांति व ध्यान में एकग्रता बढ़ाता हैं । इच्छाशक्ति पर काबू, कुण्डली को जागृत करने में सहायता करता हैं । 
      स्त्री रोग जैसे गर्भाशय संबंधीत रोग शरीर के सभी प्रवाही और रक्त संबंधी बीमारियां, अनिद्रा, दिमाग, बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जलसम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग होते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मस्तिष्क विकार भी होते हैं । गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं। यह ग्रह हृदय, फेफडा, मस्तिष्क, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन-नली, शरीरस्थ इत्यादि का कारक हैं। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ो की बीमारी होती हैं। 
तीनमुखी रूद्राक्ष : - तीनमुखी रूद्राक्ष ब्रह्मस्वरूप हैं। इसमें ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनों शक्तियों का समावेश है। इसका प्रधान ग्रह मंगल हैं। मंगल को ज्योतिषशास्त्र में सेनापति का दर्जा दिया गया हैं। यह अग्निरूप हैं। इसको धारण करने से आत्मविश्वास, निर्भयता, द्वेश, उच्चज्ञान, वास्तुदोष आदि में फायदा होता हैं । मंगल यदि किसी भी दुष्प्रभाव में होता हैं तो उसे रक्त रोग, हैजा, प्लेग, चेचक, रक्तचाप, शक्ति क्षीणता, नारी अंगरोग, अस्थिभ्रंश, बवासीर, मासिक धर्म रोग, अल्सर, अतिसार, चोट लगना और घाव आदि रोग होते है। मंगल ग्रह की प्रतिकूलता से उत्पन्न इन सभी रोगों के निदान और निवारण के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष आवश्यक रूप से धारण करना चाहिए। वृश्चिक और मेष राशि वालो के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त ही भाग्योदयकारी हैं।
 चारमुखी रूद्राक्ष : - चारमुखी रूद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप माना गया हैं। यह चार वेदों का रूप भी माना गया हैं। चारमुखी रूद्राक्ष के धारणकर्ता की आँखों में तेजस्विता , वाणी में मधुरता तथा शरीर में स्वास्थ्य एवं अरोग्यजनित कान्ति उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, उनके चतुर्दिक सम्मोहन का प्रभाव मण्डल निर्मित हो जाता है। यह रूद्राक्ष मन की एकाग्रता को बढाता हैं जो लेखक, कलाकार, विज्ञानी, विद्यार्थी और व्यापारियों को लाभकारी हैं । इसके प्रभाव से चपलता, चातुर्य और ग्रहण शक्ति में लाभ होता हैं । इस रूद्राक्ष पर बुध ग्रह का नियंत्रण होता हैं। 
     ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को युवराज कहा जाता है। यह नपुंसक तथा सौम्य ग्रह हैं। बुध ग्रह विद्या , गणित , ज्ञान, गाल ब्लाडर , नाड़ी संस्थान आदि का कारक हैं। इसकी प्रतिकुलता से अपस्मार , नाक, कान तथा गले के रोग, नपुंसकता, हकलाना, सफेद दाग, मानसिक रोग , मन की अस्थिरता, त्वचारोग, कोढ़, पक्षाघात पीतज्वर , नासिका रोग , दमा आदि रोग होते हैं। इन सभी के निदान के लिए चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभप्रद हैं। व्यापारियों और मिथुन तथा कन्या राशि वालो को चारमुखी रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। पन्ने की जगह चारमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पन्ने से कई गुना लाभ प्राप्त हो सकता हैं 
 पाँचमुखी रूद्राक्ष : - पाँचमुखी रूद्राक्ष स्वयं रूद्र स्वरूप हैं इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। यह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी माना जाता हैं। इससे यशोवृद्धि और वैभव सम्पन्नता आती हैं। इसका संचालन ग्रह बृहस्पति है। इसके उपयोग से मानसिक शांति, बुरी आदतों से छुटकारा, मंत्र सिद्धी, पवित्र विचार, व अधिक कामेच्छा पर काबू पाया जा सकता हैं । यह ग्रह धन , वैभव , ज्ञान , गौरव , मज्जा , यकृत , चरण , नितंब का कारक है। 
     बृहस्पति बुरे प्रभाव में हो तो व्यक्ति को अनेक तरह के कष्ट होते है। बृहस्पति स्त्री के लिए पति तथा पुरूष के लिए पत्नि का कारक हैं। अतः इसकी प्रतिकुलता से निर्धनता और दाम्पत्य सुख में विध्न उत्पन्न होता है तथा चर्बी की बिमारी , गुर्दा , जाँघ , शुगर और कान सम्बन्धी बीमारिया पैदा होती हैं। मोटापा, उदर गांठ, अत्यधिक शराब सेवन, एनिमिया, पिलीया, चक्कर आना, व मांस पेशियों के हठीले दर्द आदि के निदान के लिए पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। धनु और मीन राशि वाले तथा व्यापारियों को पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। पुखराज से यह कहीं अधिक गुणकारी और सस्ता हैं।
 छः मुखी रूद्राक्ष : - यह रूद्राक्ष शिव पुत्र गणेश और कार्तिकेय स्वरूप है। इसके धारण से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं। इसमें गणेश और कार्तिकेय स्वरूप होने के कारण इसके धारणकर्ता के लिए गौरी विशेष रूप से वरदायिनी और माता की भाँती सदैव सुलभ होती है। इस रूद्राक्ष का नियत्रंक और संचालक ग्रह शुक्र हैं जो भोग विलास और सुख सुविधा का प्रतिनिधि हैं।
      इसके प्रयोग द्वारा प्रेम, कामसुख, संगीत, कविता, सृजनात्मक और कलात्मक कुशलता, समझदारी, ज्ञान और वाक्य चातुर्य में लाभ होता हैं । यह ग्रह गुप्तेन्द्रिय, पूरूषार्थ, काम वासना , उत्तम भोग्य वस्तु , प्रेम संगीत आदि का कारक हैं। इस ग्रह के दुष्प्रभाव से नेत्र, यौन, मुख, मूत्र, ग्रीवा रोग और जलशोध आदि रोग होते हैं । कोढ़, नपुंसकता और मंद कामेच्छा, पथरी और किडनी सम्बन्धि रोग, मुत्र रोग, शुक्राणु की कमी व गर्भावस्था के रोग आदि में छः मुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। वृष और तुला राशि वाले के लिए विशेष लाभकारी है।
 सातमुखी रूद्राक्ष : - सातमुखी रूद्राक्ष के देवता सात माताएँ और हनुमानजी हैं। पद्मपुराण के अनुसार सातमुखी रूद्राक्ष के सातो मुख में सात महाबलशाली नाग निवास करते हैं। सात मुखी रूद्राक्ष सप्त ऋषियों का स्वरूप हैं। यह रूद्राक्ष सम्पत्ति , कीर्ति और विजय श्री प्रदान करने वाला होता हैं। सात मुखी रूद्राक्ष साक्षात् अनंग स्वरूप है। अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होता हैं। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती हैं। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं।इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इसके प्रयोग से तंदुरूस्ती, सौभाग्य और सम्पत्ति, रूके हुए कार्य, निराशापन को दूर किया जाता हैं।
       वशीकरण, आत्मविश्वास में वृद्धि, कामसुख व स्थिर विकास के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए । इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि हैं यह रोग तथा मृत्यु का कारक हैं। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक हैं। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह हैं। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चितां, अस्थि रोग, क्षय, केंसर, मानसिक रोग, जोड़ो का दर्द, अस्थमा, बहरापन, थकान, आदि रोग हो सकते है। शनि ग्रह भाग्य का कारक भी हैं। कुपित होने पर यह हताशा , कार्य विलम्बन आदि उत्पन्न करता हैं। जन्म कुण्डली में यदि नवें घर तथा नवें घर के स्वामी से किसी भी तरह संबद्ध हो जाता हैं तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय कठिनाई से व देरी से होता हैं। शनि और शनि की ढैया और साड़ेसाती से पीड़ित लोगों को शनि ग्रह को शान्त करने के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभदायी हैं। 
आठमुखी रूद्राक्ष : - आठमुखी रूद्राक्ष में कार्तिकेय , गणेश ,अष्टमातृगण ,अष्टवसुकगण और गंगा का अधिवास माना गया है। इसके प्रयोग से शुत्रओं, विपत्तियों पर विजय प्राप्त होती हैं । दीर्घायु, ज्ञान, रिद्धी-सिद्धी के लिए व मन की एकाग्रता बढ़ाने हेतु भी यह रूद्राक्ष धारण किया जाता हैं । यह रूद्राक्ष मिथ्या भाषण से उत्पन्न पापों को नष्ट करता है। यह सम्पूर्ण विध्नों को नष्ट करता हैं। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है। जो छाया ग्रह हैं। इसमें शनि ग्रह की भांति शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाशहीनता का दोष हैं। यह शनि की तरह लम्बा ,पीड़ादायक ,अभाव ,योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात भी घटित कर देता हैं। चर्मरोग , फेफड़े की बीमारी , पैरों का कष्ट, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले व मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह हैं। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती हैं। 
 नौमुखी रूद्राक्ष : - नौमुखी रूद्राक्ष भैरव स्वरूप हैं। इसमें नौ शक्तियों का निवास हैं इसके धारण करने से सभी नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं। इसके धारण करने से यमराज का भय नहीं रहता हैं। इसके उपयोग से सफलता, सम्मान, सम्पत्ति, सुरक्षा, चतुराई, निर्भयता, शक्ति, कार्यनिपुणता, वास्तुदोष में लाभ लिया जा सकता हैं । नौमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह केतु हैं जो राहु की तरह ही छाया ग्रह हैं। जिस प्रकार राहु शनि के सदृश हैं , उसी प्रकार केतु मंगल के सदृश हैं। मंगल की तरह केतू भी अपने सहचर्य और दृष्टि के प्रभाव में आने वाले पदार्थो को हानि पहुँचाता हैं। केतू के कुपित होने पर फेफड़े का कष्ट , ज्वर , नेत्र पीड़ा, बहरापन, अनिद्रा, संतानप्राप्ति, उदर कष्ट, शरीर में दर्द दुर्घटना एवं अज्ञात कारणों से उत्पन्न रोग परेशान करते हैं। केतू को मोक्ष का कारक भी माना गया हैं। केतू ग्रह की शांति के लिए लहसुनिया रत्न का प्रयोग किया जाता हैं किन्तू नौमुखी रूद्राक्ष लहसुनियां रत्न से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं।
दसमुखी रूद्राक्ष : - दशमुखी रूद्राक्ष पर यमदेव , भगवान विष्णु , महासेन दस दिक्पाल और दशमहाविद्याआओं का निवास होता हैं। इसका इष्टदेव विष्णु हैं। यह सभी ग्रहों को शांत करता हैं । इसके उपयोग से पारिवारिक शांति, सभी प्रकार की सफलता, दिव्यता एवं एकता प्राप्त होती हैं । इसके धारण से सभी प्रतिकूल ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। इसके धारण से सभी नवग्रह शांत और प्रसन्न होते हैं। इस रूद्राक्ष का प्रभाव ग्रहातंरों तक जाता हैं और ग्रहातंरों से आता हैं। यह समस्त सुखों को देने वाला शक्तिशाली और चमत्कारी रूद्राक्ष हैं। इसके उपयेग से कफ, फैफड़े सम्बन्धि रोग, चिंता, अशक्ति, हृदय रोग आदि में लाभ होता हैं। 
 ग्यारहमुखी रूद्राक्ष : - ग्यारहमुखी रूद्राक्ष एकादश रूद्र स्वरूप हैं। यह अत्यन्त ही सौभाग्यदायक रूद्राक्ष हैं। एक सौ सहस्त्र गायों के सम्यक दान से जो फल प्राप्त होता हैं वह फल ग्यारहमुखी रूद्राक्ष के धारण करने से तत्काल प्राप्त होता है। इस रूद्राक्ष पर इन्द्र का स्वामित्व हैं इन्द्र की प्रसन्नता से ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती हैं। इसके धारण करने से समस्त इन्द्रिया और मन नियंत्रित होता हैं। इसके प्रयोग से कुण्डली जागरण, योग सम्बंधी एकाग्रता, वैद्यकिय कार्य, निर्भयता, निर्णय क्षमता एवं सभी प्रकार से अकस्मात सुरक्षा में लाभ होता हैं । यह रूद्राक्ष योग साधना में प्रवृत व्यक्तियों के लिए बहुत अनुकूल हैं। यह शरीर , स्वास्थ्य , यम नियम , आसन , षटकर्म या अन्य यौगिक क्रियाओं में आने वाली बाधाओं को नष्ट करता हैं। स्वास्थ्य को सुद्रण बनाने वाले साधकों के लिए यह भगवान शिव का अनमोल उपहार हैं। इसके प्रयोग से स्त्रीरोग, स्नायुरोग, पुराने हठीले रोगों से छुटकारा, शुक्राणु की कमी व संतानप्राप्ति में लाभ होता हैं ।  
बारहमुखी रूद्राक्ष : - बारहमुखी रूद्राक्ष आदित्य अर्थात सूर्य स्वरूप हैं। सभी शास्त्र और पुराणों में इस रूद्राक्ष पर सूर्य की प्रतिष्ठा मानी गई हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाला निरोगी और अर्थलाभ करके सुख भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता हैं दरिद्रता कभी उसे छू भी नहीं पाती। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार की दुर्घटनाओं से बचाकर शक्ति प्रदान करता हैं। जो मनुष्य सर्वाधिकार सम्पन्न बनकर सम्राट की तरह शासन करना चाहता हो उसे यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। क्योंकि सूर्य स्वयं बारहमुखी रूद्राक्ष पर प्रतिष्ठित होकर धारणकर्ता को सूर्यवत् तेजस्विता , प्रखरता और सम्राट स्वरूपता प्रदान करता हैं। 
      नेतृत्व के गुण, बड़े सम्मान, ताकत, आत्मसम्मान, आत्म विश्वास, प्रेरणा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, एवं ताकत आदि इसके प्रयोग से प्राप्त होते हैं। विश्व के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य इस रूद्राक्ष के माध्यम से धारणकर्ता के मन के भीतर के दुःख , निराशा , कुंठा , पीड़ा और दुर्भाग्य के अंधकार को दूर कर देता है। सूर्य तेजोपुंज हैं , अतः बारहमुखी रूद्राक्ष रूद्राक्ष भी धारणकर्ता को तेजस्वी और यशस्वी बना देता हैं। गुणों में यह माणिक्य से अधिक प्रभावी तथा मूल्य में अधिक सस्ता हैं। इसके प्रयोग द्वारा सरदर्द , गंजापन, बुखार, ऑखों के रोग, हृदय रोग, दर्द और बुखार, मुत्राशय एवं पित्ताशय की जलन जैसे रोगों में लाभ होता हैं। 
 तेरहमुखी रूद्राक्ष - तेरहमुखी रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव स्वरूप हैं। यह सभी कामनाओं और सिद्धियों को देने वाला हैं। इसे धारण करने से कामदेव प्रसन्न होते है। इसे धारण करने से वशीकरण और आकर्षण होता हैं । जीवन के सभी ऐशो-आराम, सुन्दरता, रिद्धी-सिद्धी और प्रसिद्धी, वशीकरण एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इसका उपयोग लाभकारी होता हैं। जो व्यक्ति सुधा-रसायन का प्रयोग करना चाहते हैं, जो धातुओं के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हैं जिसका स्वभाव रसिक हैं उन्हे इस रूद्राक्ष के धारण से सिद्धि प्राप्त होती हैं, सभी कामनाओं की पूर्ति अर्थ-लाभ, रस-रसायन की सिद्धियॉ और सम्पूर्ण सुख-भोग मिलता हैं । 
     इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास हैं इसीकारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियां प्रदान कराने में सक्षम हैं। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं। इसके उपयोग से किडनी, नपुंसकता, मुत्राशय के रोग, कोढ़, गर्भावस्था के रोग, शुक्राणु की कमी आदि में आश्चर्यजनक लाभ होता हैं ।
 चौदहमुखी रूद्राक्ष - चौदहमुखी रूद्राक्ष श्री कंठ स्वरूप हैं । यह रूद्रदेव की ऑखों से विशेष रूप से उत्पन्न हुआ हैं। जो व्यक्ति इस परमदिव्य रूद्राक्ष को धारण करता है, वह सदैव ही देवताओं का प्रिय रहता हैं । यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक हैं । यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला हैं । इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती हैं । इसके उपयोग द्वारा जातक की सभी तरह के बुरे तत्वों से रक्षा होती हैं । यह जातक को गरीबी से दूर रखता हैं । छटी इन्द्रीय व अर्न्तज्ञान तथा अतिंद्रिय शक्ति का मालिक बनाता हैं। चौदहमुखी रूद्राक्ष में हनुमान जी का भी अधिवास माना गया हैं यह रूद्राक्ष भूत, पिशाच, डाकिनी, शकिनी से भी रक्षा करता हैं । इससे बल और उत्साह का वर्धन होता हें । 
     इससे निभ्रयता प्राप्त होती हैं और संकटकाल में सरंक्षण प्राप्त होता हैं । विपत्ति और दुर्घटना से बचने के लिए हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले चौदहमुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिए । यह रूद्राक्ष चमत्कारी हैं । इससे अनंतगुण विद्यमान हैं । शास्त्र प्रमाण के अनुसार मानव-वाणी से इनके गुणों का व्याख्यान संभव नहीं हैं इसका धारणकर्ता स्वर्ग को प्राप्त करता हैं । वह चौदहों भुवनों का रक्षक और स्वामी बन जाता हैं। जिसने चौदहमुखी रूद्राक्ष धारणकर लिया शनि जैसा क्रोधी ग्रह भी लाख चाहकर उसका बुरा नहीं कर सकता । यह शास्त्रोक्त सत्य हैं । साधन सम्पन्न लोगों को आवश्यक रूप से इस दिव्य रूद्राक्ष का उपयोग अवश्य करना चाहिए। इसके प्रयोग द्वारा निराशापन, मानसिक रोग, अस्थमा, पक्षाघात, वायु के रोग, बहरापन, केंसर, चित्तभ्रम, थकान और पैरों के रोगों में लाभ होता हैं। 
 गौरी शंकर रूद्राक्ष :- मुख वाले रूद्राक्षों में गौरीशंकर रूद्राक्ष सर्वोपरि हैं, जिस प्रकार लक्ष्मी का पूजन उनके पति नारायण (विष्णुजी) के साथ करने लक्ष्मी-नारायण की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं ठीक इसी प्रकार गौरी (माँ पार्वती) के साथ देवाधिदेव भगवान शिव का पूजन करने से गौरी-शंकर की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष धारण पूजन से तो गौरीशंकर की कृपा निश्चित रूप से प्रापत होती ही हैं इससे किंचित मात्र भी संदेह नहीं हैं ।
      इसके उपयोग से पारिवारिक एकता, आत्मिक ज्ञान, मन और इंद्रियों पर काबू, कुण्डलिनी जागरण एवं पति-पत्नि की एकता में वृद्धि होती हैं। बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष के धारण करने से समूल नष्ट होता हैं जन्म के पाप इस रूद्राक्ष के धारण मात्र से काफूर हो जाते हैं गौरीशंकर रूद्राक्ष में गौरी स्वरूप भगवती पार्वती का निवास होने के कारण इस रूद्राक्ष पर भगवान शिव की विशेष कृपा हैं मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित मनुष्यों/स्त्रियों के लिए ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की भांति काम करता हैं । जन्म पत्री में यदि दुखदायी ‘‘कालसर्प योग‘‘ पूर्णरूप से अथवा आंसिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी + 9 मुखी + गौरीशंकर रूद्राक्ष अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योकिं कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं । 
 गणेश रूद्राक्ष :- सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक अडचनें और विलम्ब होने पर ‘‘गणेश रूद्राक्ष‘‘ का धारण चमत्कार दिखाता हैं । विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य हैं परम दुर्लभ हैं। इसके प्रयोग से विद्या व ज्ञान प्राप्ति, मानसिक असंतोष एवं सभी तरह के अवरोध दूर होते हैं । विशेष रूप से संतान बाधा एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता हैं । त्वचा रोग, हिचकी, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश, केंसर एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले दुष्परिणामों में उत्तम लाभ देता हैं। 
 पथरी रूद्राक्ष :- यह रूद्राक्ष उत्कृष्ट गुणवन्त रूद्राक्ष हैं । आमतौर पर पाए जाने वाले रूद्राक्ष से इसकी गुणवत्ता काफी उच्च होती हैं । इसमें विटामिन और इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो की मात्रा अधिक होती हैं । पथरी रूद्राक्ष कुदरती तौर पर मजबूत होने के कारण इसकी आयु कई सौ साल की होती हैं। उच्च परिणाम के लिए पथरी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए ।


जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत

सौरमंडल में मौजूद ग्रहों का हमारे जीवन पर कितना प्रभाव पड़ता है, यह वही समझ सकता है जिसने इन बदलावों को कभी महसूस किया हो। यकीन मानिए, जिस नक्षत्र में हम जन्म लेते हैं, उस समय मौजूद ग्रह सारे जीवन हमें प्रभावित करते हैं। अब यह प्रभाव सकारात्मक होने के साथ नकारात्मक भी हो सकता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रत्येक ग्रह किसी एक राशि में कुछ समय तक रहता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक राशि में प्रवेश करने पर ये ग्रह ना केवल उस राशि, वरन् अन्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं। आज हम सूर्य राशि के वृष राशि में प्रवेश करने की घटना पर चर्चा करने जा रहे हैं। 14 मई, 2017 सूर्य ग्रह, वृषभ राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य देव यहां पूरे एक महीने के लिए रहेंगे, और इसके बाद 15 जून को वृषभ राशि से निकलकर मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। 
Know-the-fate-of-people-who-will-change-the-Sun-in-Taurus-जानिए वृषभ राशि में सूर्य जाने से बदलेगी किन लोगों की किस्मत         वैदिक ज्योतिष में सूर्य को नवग्रहों के राजा की उपाधि दी गई है। प्राणी जगत के लिए यह ऊर्जा का केन्द्र है, इसलिए सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। प्रत्येक जातक की कुंडली में सूर्य उनके पिता का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए यह पितृ कारक भी होता है। 14 मई 2017 रविवार को रात्रि 11:11 बजे सूर्य मेष राशि से वृषभ राशि में प्रवेश करेगा और 15 जून 2017 गुरुवार को सुबह 05:47 पर वृषभ राशि से मिथुन राशि में गोचर करेगा। निश्चित ही सूर्य के इस गोचर का प्रभाव सभी 12 राशियों पर होगा। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार मेष का सूर्य लोगों को अप्रैल से ही सुख-सुविधाओं का जमकर आभास करा रहा है। 13 अप्रैल से शुरू हुई मेष संक्रांति ब्राह्मणों और धर्म-कर्म करने वालों सहित अन्य वर्ग के लोगों के लिए लाभप्रद है। 
        ज्योतिर्विद राजकुमार चतुर्वेदी के अनुसार सूर्य की यह युक्ति हालांकि सितंबर माह तक रहेगी,लेकिन 14 मई को सूर्य के वृष राशि में प्रवेश के करने के साथ ही कुछ दिनों के लिए यह लोगों को परेशान भी करेगा। वर्तमान में शनि धुन राशि में गोचर कर रहा है। मेष का सूर्य, शनि का धनु राशि में गोचर लोगों के लिए अच्छे दिन लेके आए हैं। ग्रहों इन युक्तियों से उद्योगों एवं निवेशों के लाभ में अप्रत्याशित वृद्धि होगी तो रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। स्वास्थ्य सेवाओं नवीन तकनीक का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचेगा। रियल और इन्फ्रा सेक्टर में गिरावट का दौर रहेगा। भूमि-मकानों की कीमतों में कमी के साथ-साथ किराये में भी कमी आएगी। 

वर्तमान में ऐसी है ग्रहों की चाल--- 
 उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं दयानन्द शास्त्री के अनुसार सूर्य वर्तमान में मेष राशि में चल रहा है। यह 14 मई को रात 10.55 बजे वृष राशि में प्रवेश करेगा। वर्तमान वृष राशि विचरण कर रहा मंगल 26 मई को मिथुन राशि में प्रवेश करेगा। मेष का बुध तीन जून को वृष में जाएगा। वर्तमान में कन्या राशि में विचरण कर रहा वक्र गति का गुरु 9 जून को कन्या राशि में मार्ग गति पकड़ लेगा तथा 12 सितंबर को कन्या राशि को छोड़कर तुला राशि में प्रवेश करेगा। मीन का शुक्र 31 मई को मेष राशि में प्रवेश करेगा। धनु राशि में वक्री हुआ शनि 25 अगस्त तक रहेगा। 

 जानिए क्या और केसा रहेगा यह रहेगा इस परिवर्तन का राशिगत प्रभाव--- (यह एक महीना वृषभ राशि के जातकों के साथ अन्य ग्यारह राशि के लिए कैसा रहेगा)-- 
  1. मेष: कुछ कठिनाइयां, छोटे भाई बहनों से विवाद। 
  2. वृष : पिता की सेहत में गिरावट, 21 जून के बाद समय अच्छा। 
  3. मिथुन : नाम एवं प्रसिद्धि मिलेगी, कानून से जुड़े मामलों में सफलता।  
  4. कर्क : परिवार को लेकर परेशानी, वाद-विवाद बढ़ सकता है। 
  5. सिंह : आय में वृद्धि की संभावना, प्रसिद्धि बढ़ेगी। 
  6. कन्या : मां की सेहत में गिरावट सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। 
  7. तुला : बड़ी उपलब्धि मिल सकती है, प्रोपर्टी से लाभ होगा। 
  8. वृश्चिक-: मानसिक तनाव, स्वास्थ्य में गिरावट।  
  9. धनु :- स्वास्थ्य में गिरावट, भाई-बहन के जीवन में समृद्धि। 
  10. मकर :- जून में उन्नति के दरवाजे खुलेंगे, लंबी यात्रा के योग। 
  11. कुंभ:- सपने सच होंगे, जून के बाद कार्य में अधिक मन लगेगा। 
  12. मीन :- खर्चे होंगे, मां की सेहत में गिरावट आएगी।

वट सावित्री व्रत वर्ष 2017 में 25 मई 2017 (गुरूवार) को

Vat-Savitri-fast-on-May-25-2017-Thursday-in-2017-वट सावित्री व्रत वर्ष 2017 में 25 मई 2017 (गुरूवार) कोज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सावित्री का व्रत किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि जो भी स्त्री इस व्रत को करती है उसका सुहाग अमर हो जाता है। जिस तरह से सावित्री ने अपने अपने पति सत्यवान को यमराज के मुख से बचा लिया था उसी प्रकार से इस व्रत को करने वाली स्त्री के पति पर आने वाल हर संकट दूर हो जाता है।हिन्दू धर्म में वट सावित्री व्रत को करवा चौथ के समान ही माना जाता है। स्कन्द व भविष्य पुराण के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को किया जाता है, लेकिन निर्णयामृतादि के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को करने का विधान है। भारत में वट सावित्री व्रत अमावस्या को रखा जाता है। इस व्रत को संपन्न कर सावित्री ने यमराज को हरा कर अपने पति सत्यवान के प्राण बचाए थे।
       इस तरह सावित्री ने अपने सत और पतिनिष्ठा से न सिर्फ अपने पति के प्राण वापस पाए वल्कि अपने अंधे सास ससुर के नेत्र की दृष्टि और अपने पुत्र हीन पिता के लिए १०० पुत्र भी वरदान के रूप में पाए। महाभारत के वन पर्व में इस कथा के बारे में विस्तार से चर्चा मिलती है। जब युधिष्ठिर अपने वनवास के दौरान द्रौपदी के दुःख से दुखी होकर मार्कण्डेय ऋषि से पूछते है। महर्षि ! क्या इतिहास में द्रौपदी के सामान दूसरी स्त्री भी रही है, जिसका जन्म तो हुआ हो राजकुल में लेकिन विधि के विधान से उसने असह्य कष्ट भोगे हों। इस पर मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठिर को सत्यवान और सावित्री की कहानी सुनाई। 
       इस वर्ष 2017 में वत सावित्री व्रत 25 मई 2017 (गुरूवार) को रखा जाएगा। इस व्रत के दिन स्त्रियाँ वट( बरगद ) वृक्ष के नीचे सावित्री-सत्यवान का पूजन करती है।इस कारण से यह व्रत का नाम वट-सावित्री के नाम से प्रसिद्ध है।इस व्रत का विवरण स्कंद पुराण, भविष्योत्तर पुराण तथा निर्णयामृत आदि में दिया गया है। हमारे धर्मिक ग्रंथों में वट वृक्ष में पीपल के वृक्ष की तरह हीं ब्रह्मा, विष्णु व महेश की उपस्थिति मानी गयी है तथा ऐसी मान्यता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत आदि करने तथा कथा सुनने से मनवांछित फल मिलता है | --------------------------------------------------------------------------------------------------- 
जानिए वट सावित्री व्रत की पूजन विधि----
 सर्वप्रथम विवाहित स्त्रिया सुबह उठकर अपने नित्य क्रम से निवृत हो स्नान करके शुद्ध हो जायें। फिर नये वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार कर लें। इसके बाद पूजन के सभी सामग्री को टोकरी अथवा डलिया / बैग में व्यवस्थित कर ले। तत्पश्चात् वट वृक्ष के नीचे जाकर वहाँ पर सफाई कर सभी सामग्री रख लें। सबसे पहले सत्यवान तथा सावित्री की मूर्ति को निकाल कर वहाँ स्थापित करें । अब धूप, दीप, रोली, सिंदूर से पूजन करें । लाल कपड़ा सत्यवान-सावित्री को अर्पित करें तथा फल समर्पित करें। फिर बाँस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करें। बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगायें। अब धागे को बरगद के पेड़ में बाँधकर यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करें इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा पंडित जी से सुने तथा उन्हें यथा सम्भव दक्षिणा दें या कथा स्वयम पढे। फिर अपने-अपने घरों को लौट जायें। घर में आकर उसी पंखें से अपने पति को हवा करें तथा उनका आशीर्वाद लें। उसके बाद शाम के वक्त मीठा भोजन करें 
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जानिए वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री --- 
  1.  सत्यवान-सावित्री की मूर्ति (कपड़े की बनी हुई) 
  2. बाँस का पंखा 
  3. लाल धागा 
  4. धूप 
  5. मिट्टी का दीपक 
  6. घी 
  7. फूल 
  8. फल( आम, लीची तथा अन्य फल) 
  9. कपड़ा – 1.25 मीटर का 
  10. दो सिंदूर जल से भरा हुआ पात्र 
  11. रोली 

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जानिए जानिए वट सावित्री व्रत में चना क्यों है जरूरी--- 
 सावित्री और सत्यवान की कथा में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है। सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं। 
      इसके बाद यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को सौंप दिये। सावित्री चने को लेकर सत्यवान के शव के पास आयी और चने को मुंह में रखकर सत्यवान के मुंह में फूंक दिया। इससे सत्यवान जीवित हो गया। इसलिए वट सावित्री व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है। जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंसे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है। 
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यह हैं मुख्य कारण या कथा वट सावित्री व्रत की पूजन--- 
 सुबिख्यात तत्वज्ञानी राज ऋषि अश्वपति की एकमात्र कन्या थी। अपने वर के खोज में जाते समय उसने वनवासी निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का वरण कर लिया। सावित्री मन ही मन अपने वरन से खुश वापस घर चली आई और अपने वरण का वृतांत पिता से सुना दिया। राजा अश्वपति के घर नारद जी पधारे थे। राजा ने पुत्री द्वारा वर्णित सत्यवान की कुंडली नारद जी से दिखाई। कुंडली देख कर नारद जी बोले ये लड़का तो अल्पायु है। इस साल के अंत में इसकी मृत्यु निश्चित है। राजा और देवर्षि दोनों ने सावित्री को बहुत समझाया लेकिन, सावित्री मन से सत्यवान को अपना पति मान चुकी थी अपने विचार से अडिग रही। सावित्री सत्यवान से विवाह कर के राजमहल के सुख को छोड़कर वन में चली आई। वल्कल वस्त्र धारण कर वन पुष्पों से श्रृंगार कर अपने पति के अनुरुप आचरण करने लगी। 
        वह मन से अंधे सास ससुर और पति की सेवा करती और जंगल में जो कन्द मूल मिलते उन्ही से अपना भरण पोषण करती। सत्यवान के मृत्यु का दिन निकट आ पंहुचा। एक दिन सत्यवान जंगल में समिधा के लिए लकड़ियां काटने जाने लगे। आज सत्यवान के जीवन का अंतिम दिन है यह सोचकर सावित्री भी उनके साथ जंगल में जाने लगी। सत्यवान के बहुत समझने पर भी जब सावित्री नहीं मानी तो सत्यवान उसे अपने साथ ले जाने को तैयार हो गए। लकड़िया काटते हुए अचानक सत्यवान को सर में दर्द होने लगा और चक्कर आने लगा। वो कुल्हाड़ी फ़ेंक कर पेड़ से नीचे उतर आये। पति का सर अपने गोद में लेकर सावित्री अपने आँचल से हवा करने लगी। थोड़ी देर में सावित्री ने दक्षिण दिशा से अपने ओर आते हुए भैंसे पर सवार एक पुरुष को देखा। इस देव पुरुष का काला शरीर सुन्दर अंगवाला था और इसने अपने हाथ में यम पाश लिए हुए थे। 
         देखते देखते इस देवपुरुष ने सत्यवान को पाश में जकड लिया और सत्यवान के शारीर से अंगुष्ठ मात्र आकार वाले पुरुष को बलात बाहर खींच लिया। आर्त स्वर में अत्यन्त व्याकुल होकर सावित्री ने उस पुरुष से पूछा। हे देव ! आप कौन है और इस तरह मेरे ह्रदय के स्वामी को बल पूर्वक खींच कर कहा ले जा रहे हैं। सावित्री के पूछने पर यमराज ने उत्तर दिया मैं यम हूँ तुम्हारे पति की आयु क्षीण हो गयी है इसलिए मैं इसे ले जा रहा हूँ। तुम्हारे सतीत्व के तेज के सामने मेरे दूत टिक नहीं पाते इस लिए मैं स्वयं आया हूँ। हे तपस्वनी मार्ग से हट जावो और मुझे मेरा काम करने दो। यह कह कर यमराज दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे। सावित्री भी यम के पीछे पीछे जाने लगी। यमराज ने बहुत समझाया लेकिन सावित्री ने कहा जहां मेरे पति देव जा रहे है मैं भी वही जाउंगी। यमराज बार बार मन करते रहे लेकिन सावित्री पीछे पीछे जाती रही। पतिव्रता स्त्री के तप और निष्ठा से हारकर यमराज ने कहा की तुम अपने पति के बदले ३ वरदान मांग लो। 
    पहले वर में सावित्री ने अपने अंधे सास ससुर की आँखे मांगी। यमराज ने कहा एवमस्तु कहा। दूसरे वरदान में उसने अपने पिता के सौ पुत्र मांगे। यमराज ने दूसरा वरदान भी दे दिया। अब तीसरे वरदान की बारी थी। इसबार सावित्री ने अपने लिए सत्यवान से तेजस्वी पुत्र का वरदान माँगा। यमराज एवमस्तु कह कर जाने लगे तो सावित्री ने उन्हें रोकते हुए कहा। पति के विना अगर पुत्र कैसे सम्भव। ऐसा कह सावित्री ने यमराज को उलझन में डाल दिया। बाध्य होकर यमराज को सत्यवान को पुनर्जीवित करना पड़ा। इसतरह सावित्री ने अपने सत और पतिनिष्ठा से न सिर्फ अपने पति के प्राण वापस पाए वल्कि अपने अंधे सास ससुर के नेत्र की दृष्टि और अपने पुत्र हीन पिता के लिए १०० पुत्र भी वरदान के रूप में पाए। 
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वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि 'राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी।' सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान थी। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। 
         सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह रचाया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था। पूजा के समय टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें। इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें। 
 फिर निम्न श्लोक से सावित्री को अर्घ्य दें : - 
 अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान्‌ पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥ 
 तत्पश्चात सावित्री तथा सत्यवान की पूजा करके बड़ की जड़ में पानी दें। 

 इसके बाद निम्न श्लोक से वटवृक्ष की प्रार्थना करें -- 
 यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा॥ 

 --पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें। 
--जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें। 
--बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें। 
--भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर सासु जी के चरण-स्पर्श करें।
--यदि सास वहां न हो तो बायना बनाकर उन तक पहुंचाएं। 
--वट तथा सावित्री की पूजा के पश्चात प्रतिदिन पान, सिन्दूर तथा कुंमकुंम से सौभाग्यवती स्त्री के पूजन का भी विधान है। यही सौभाग्य पिटारी के नाम से जानी जाती है। सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है। कुछ महिलाएं केवल अमावस्या को एक दिन का ही व्रत रखती हैं। 
 --पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें। 
 अंत में निम्न संकल्प लेकर उपवास रखें : -- 
 मम वैधव्यादिसकलदोषपरिहारार्थं ब्रह्मसावित्रीप्रीत्यर्थं सत्यवत्सावित्रीप्रीत्यर्थं च वटसावित्रीव्रतमहं करिष्ये।
 --इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का स्वयं श्रवण करें एवं औरों को भी सुनाएं। 
 उद्देश्य-- 
सैभाग्य की कामना के संकल्प से पूजा के बाद स्त्रियां अक्षय वट की परिक्रमा करती हैं और धागे के फेरे लगाती हैं। यदि आधुनिक संदर्भ में सोचा जाए तो कथा तो शायद सरल, सुगम तरीके से स्त्रियों को बात समझाने के लिए है और वृक्ष पूजा का अनुष्ठान वृक्ष से नाता जोड़ने के लिए। धरती पर हरे-भरे पेड़ रहें तभी तो स्त्री उनकी पूजा कर सकेगी।
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Editor In Chief : Dr. Umesh Sharma
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