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अशुभ मंगल या मंगल दोष के कारण होने वाले रोग/बीमारियां -- एक ज्योतिषिय विश्लेषण

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      ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चंद्र, शनि, राहु एवं केतु के रूप में नौ ग्रह होते हैं। सामान्य रूप से बृहस्पति (गुरु), बुध और चंद्रमा को शुभ ग्रह माना जाता है और सूर्य, मंगल, शनि, राहु एवं केतु अशुभ ग्रह माने जाते हैं। इन अशुभ ग्रहों को ही रोगकारक माना जाता है। विशिष्ट और विपरीत ग्रहदशा में सभी ग्रह अपना अशुभ प्रभाव छोड़ते हैं।हर किसी के जीवन में रोग और पीड़ाएं आती रहती हैं। ज्योतिष के अनुसार व्यक्ति के जीवन में पीड़ा और रोगों के लिए ग्रह नक्षत्र ही जिम्मेदार होते हैं। कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार मंगल ग्रह व्यक्ति के रक्त मज्जा और हड्डीयों पर प्रभुत्व रखता है। मंगल ही रोग और विकारों का शमन कर लंबी आयु प्रदान करता है। 
           ग्रहों की प्रतिकूलता मनुष्य और वातावरण के बीच के ऊर्जा प्रवाह को प्रभावित करती है। इसके इस असंतुलन के प्रभाव से विभिन्न प्रकार के रोग, विकार पनपते हैं। चूंकि सूर्य पित्त प्रकृति को बढ़ावा देता है, अत: इसका कमजोर एवं बलवान होना, दोनों ही दशा में समस्या खड़ी होती है।सौर मंडल में मंगल का अपना स्थान है। मंगल भी धरती को कई सारी आपदाओं से बचाता है। मंगल ग्रह धरती को शनि, राहु और केतु के बुरे प्रभाव से भी बचाता है। मंगल के कारण ही समुद्र में मूंगे की पहाड़ियां जन्म लेती हैं और उसी के कारण प्रकृति में लाल रंग उत्पन्न हुआ है।मंगल उष्ण प्रकृति का ग्रह है.इसे पाप ग्रह माना जाता है. विवाह और वैवाहिक जीवन में मंगल का अशुभ प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है.मंगल दोष जिसे मंगली के नाम से जाना जाता है इसके कारण कई स्त्री और पुरूष आजीवन अविवाहित ही रह जाते हैं.
          ज्योतिष के अनुसार मंगल की चार भुजाएँ है | इनके शारीर के रोए लाल है तथा इनके हाथो में अभय मुद्रा, त्रिशूल, गदा और वर मुद्रा है | इन्होने लाल माला और लाल वस्त्र धारण कर रखे है | इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट है तथा ये मेष ( मेंढा ) के वहां पर स्वर है | ज्योतिष में मंगल को क्रूर ग्रह माना गया है जिसका अर्थ अग्नि के समान लाल है, इसलिए इसे अंगारक भी कहते है | वे स्वतंत्र प्रकृति के तथा अनुशासन प्रिय है | 
          इस ग्रह से प्रभावित जातक सेनाध्यक्ष या राजदूत आदि होते है या उच्च पदों पर कार्य करते है | उनमे नेतृत्व शक्ति विशेष होती है | वे निडर होते है, किसी भी प्रकार का जोखिम ले सकते है | खिलाडी, वायुसेना, थलसेना, नौसेना के अध्यक्ष तथा उच्च पदों पर आसीन राजनीतिज्ञ मंगल से प्रभावित माने जाते है | मंगल को भौम, कुज आदि नामो से भी जाना जाता है | नवग्रहों में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गई है | 
            शारीरिक तौर पर मंगल प्रभावित जातक स्वस्थ और माध्यम लम्बे कद के होते है | कमर पतली, छाती चौड़ी, बाल घुंगराले और आँखे लाल होती है | उनके चेहरे पर तेज होता है | मंगल मेष एवं वृशिक राशी के स्वामी है | मृगशिरा, चित्रा और घनिष्ठा नक्षत्रो का स्वामित्व भी मंगल को ही प्राप्त है | मंगल तृतीय एवं षष्ठ भाव के कारक ग्रह है | कर्क एवं सिंह लग्न की कुंडली में विशेष कारक माने जाते है एवं मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यह विशेष अकारक ग्रह बन जाते है | 
          मंगल मकर राशि में उच्च एवं कर्क राशि में नीच के होते है | जन्म-कुंडली में मंगल जिस भाव में स्थित होते है, उस भाव से सम्बंधित कार्य को अपनी स्थिति के अनुसार सुदृढ़ करते है | शुभ मंगल, मंगलकारी और अशुभ मंगल, अमंगलकारी कार्य करवाते है | मंगल शक्ति, साहस, क्रोध, युद्ध, दुर्घटना, षड़यंत्र, बीमारियों, विवाद, भूमि सम्बन्धी आदि कार्यो का कारक ग्रह है | मंगल तांबे, खनिज पदार्थो , सोने, मूंगे, हथियार, भूमि आदि का प्रतिनिधित्व करता है | 
        मंगल पित्त कारक है। यह अत्यंत उग्र है एवं उत्तेजना पैदा करता है। यह सिर, मज्जा, पित्त, हीमोग्लोबिन तथा गर्भाशय का नियमन करता है। अत: इससे संबंधित सभी रोग मंगल के प्रकोप से होते हैं। मंगल दुर्घटना, चोट, मोच, जलन, शल्यक्रिया, उच्चरक्तचाप, पथरी, हथियारों एवं विष से क्षति देता है।मंगल के कारण ही गर्मी के रोग, विषजनित रोग, व्रण, कुष्ठ, खुजली,रक्त सम्बन्धी रोग, गर्दन एवं कण्ठ से सम्बन्धित रोग,रक्तचाप, मूत्र सम्बन्धी रोग, ट्यूमर, कैंसर, पाइल्स, अल्सर,दस्त, दुर्घटना में रक्तस्त्राव, कटना, फोड़े-फुन्सी, ज्वर,अग्निदाह, चोट इत्यादि बीमारियां/रोग होते हैं | 
 ---जब मंगल-शनि की युति हो तो रक्त विकार, कोढ़या जिस्म का फट जाना आदि रोग से कष्ट होगा अथवा दुर्घटना से चोट-चपेट लगने के कारण कष्ट होता है। 
--गुरु-मंगल या चन्द्र-मंगल की युति हो तो पीलिया रोग से कष्ट होता है। 
--मंगल-राहु या केतु-मंगल की युति हो तो शरीर में टयूमर या कैंसर से कष्ट होगा। मनुष्य के शरीर में मंगल शिराओं व धमनियों की टूट-फूट, अस्थि मज्जा के रोग, रक्त्रस्राव, गर्भपात, मासिक धर्म में अनियमितता, सुजाक गठिया और दुर्घटना तथा जलना का प्रतिक है | मंगल किसी भी जातक के शरीर में रक्त,उत्तेजना,बाजू,क्रूरता,साहस,कान का करक होता हैं |मंगल अशुभ होने पर रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े एवं जिगर के रोग भी हो सकते हैं | जब कभी अशुभ मंगल अमंगलकारी हो जाता है | जिसके प्रभाव से जातक आतंकवादी, दुराचारी, षड्यंत्रकारी और विद्रोही बनता है | इन सभी से बचने के श्री अंगारेश्वर महादेव पर भात पूजा द्वारा मंगलदोष शांति अवश्य करवाना चाहिये | मंगल ग्रह की शांति के लिए शिव उपासना एवं मूंगा रत्ना धारण करने का भी विधान है | 
        यदि आपकी कुंडली में मंगलदोष है या आपकी तरक्की में यह आड़े आ रहा है तो आप रक्तदान कर इससे शांति पा सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रक्त दान मंगल दोष से मुक्ति दिलाने में भी सहायक है। रक्त दान से रक्त का शोधन होता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। इस तरह कई बीमारियां दूर रहती हैं। दान को शास्त्रों में भी महान बताया गया है। ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि रक्त मंगल का कारक है। इसके दान से मंगल (भौम) ग्रह दोष से मुक्ति मिलती है। जिन जातकों के लग्न में तीसरे, ११वें अथवा छठे, 12वें स्थान में मंगल हो उन्हें विशेष रूप से रक्त दान करना चाहिए। 
         इससे जीवन में शांति बनी रहती है। रक्तदान से ब्लड में कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम होती है। इस तरह हार्ट संबंधी बीमारियों से बचा जा सकता है। साथ ही हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) के कारण पैरालिसिस या ब्रेन हेमरेज की आशंका नहीं रहती है।यह ऑक्सीजन पार्लर का काम करता है। नए रक्त कण बोनमैरो से आने पर शरीर तरोताजा और स्वस्थ्य महसूस करता है। इसके अलावा ब्लड प्रेशर, पल्स रेट, बुखार, हेपेटाइटिस बी व सी, मलेरिया, एचआईवी, हीमोग्लोबीन, ब्लड ग्रुप की भी जांच हो जाती है। 

 अशुभ मंगल के कारण होने वाले कुछ मुख्य रोग/बीमारियां-- 
---उच्च रक्तचाप। 
----वात रोग।
---गठिया रोग। 
---फोड़े-फुंसी होते हैं। 
---जख्मी या चोट। 
---बार-बार बुखार आता रहता है।
 ---शरीर में कंपन होता रहता है। 
---गुर्दे में पथरी हो जाती है। 
---आदमी की शारीरिक ताकत कम हो जाती है। 
---एक आंख से दिखना बंद हो सकता है। 
---शरीर के जोड़ काम नहीं करते हैं। 
 ----मंगल से रक्त संबंधी बीमारी होती है। रक्त की कमी या अशुद्धि हो जाती है। 
---बच्चे पैदा करने में तकलीफ। हो भी जाते हैं तो बच्चे जन्म होकर मर जाते हैं। 
             हमारे शास्त्रों में हर विलक्षण वस्तु दान करने के लिए कही गई है। देह दान, नेत्र, अंग और रक्त दान का अपना महत्व है। ज्योतिष शास्त्र की बात करें तो रक्त को मंगल का कारक माना गया है। मंगलदोष से मुक्ति का एक माध्यम रक्तदान भी कम जिसके कारण रक्तदान करने वाले को चोरी, अग्नि समेत अन्य आकस्मिक भय नहीं सताते। यहाँ दिए गए सभी रोग प्रायः युति कारक ग्रहों की दशार्न्तदशा के साथ-साथ गोचर में भी अशुभ हों तो ग्रह युति का फल मिलता है! इन योगों को कुंडली में देखकर विचार सकते हैं। ऐसा करके आप होने वाले रोगों का पूर्वाभास करके स्वास्थ्य के लिए सजग रह सकते हैं। 

 !! जानिए की कैसे होती हैं मंगलदोष शमन के लिए भात पूजा !! 
 मंगलदोष के शमन का सरल एवं अचूक उपाय मंगल ग्रह का भात पूजन है | जिसके अनुसार सर्वप्रथम पंचांग कर्म जिसमे गणेशाम्बिका पूजन , पुण्याहवाचन, षोडश मातृका पूजन, नान्दी श्राद्ध एवं ब्राह्मन पूजन किया जाता है | तत्पश्चात भगवान श्री अंगारेश्वर पर मंगल देव का दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, अष्टगंध, इत्र एवं भांग से स्नान करा कर मंगल स्त्रोत का पाठ किया जाता है | शिव के रूप में होने के कारण रुद्राभिषेक या शिवमहिम्न स्त्रोत का पाठ किया जाता है | उसके बाद पके हुए चावल को ठंडाकर उसमे पंचामृत मिलाकर श्री अंगारेश्वर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है एवं आकर्षक श्रृंगार किया जाता है | षोडशोपचार पूजन एवं आरती करके अग्नि स्थापन, नवग्रह एवं रूद्र स्थापन पूजन कर हवन किया जाता है | विद्वानों के अनुसार मंगल ग्रह की प्रकृति गर्म है | अत: शीतलता एवं मंगल दोष की निवृत्ति के लिए भगवान मंगलदेव को भात चढ़ाया जाता है | मंगल दोष युक्त जातक जिनके विवाह में बाधा आ रही हो उन्हें श्री अंगारेश्वर पर अवश्य ही मंगलदोष निवारण के लिए भात पूजन करवाना चाहिये | 

 मंगल पूजा :---- "ॐ भौमाय नम :" पूजा, का अर्थ है, भक्ति और श्रद्धा | पूजा शब्द को 'पु-जय' या पूजा से व्युत्पन्न माना जाता है, अब शब्द पूजा को पूजा के सभी रूपों जैसे साधारण दैनिक प्रसाद से लेकर फल, फुल, पत्ते, चावल मिठाइयाँ, मंदिरों और घरों में देवताओं को समर्पित करने के लिए किया जाता है, पूजा के तीन प्रकार होते हैं: "दीर्घ", "मध्य" और "लघु" | पूजा केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि अधिकांशतः घरों में दिनों के कार्यक्रम का आरंभ भगवान की पूजा से की जाती है | जागरण / भजन / कीर्तन / रामायण या ग्रंथों का अध्ययन/ पूजा अनुष्ठान का उद्देश्य हमारे चारों ओर आध्यात्मिक बलों की स्थापना है | 
            श्री अंगारेश्वर महादेव (उज्जैन, मध्यप्रदेश) पर मंगलदोष निवारण हेतु पूजा-अनुष्ठान का उद्देश्य बाधाओं को हटाना है | जो जप करके प्राप्त किया जाता है. विशिष्ट पूजा के द्वारा हम हानिकर बल से छुटकारा, सुख, शांति और समृद्धि पा सकते है | नए उद्यम शुरू करने में सकारात्मक कंपन पैदा करने के लिए, घर, नौकरी, व्यवसाय में बाधाएं दूर करने के लिए, शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के लिए, नेतृत्व कौशल बढ़ाने के लिए हम साधना करके लाभ बढ़ा सकते हैं | सामान्य तरीकों में ध्यान, मंत्र जप, शांति, प्रार्थना शामिल हैं | उपवास या भगवान का नाम जप, धर्मदान. ये मनोरथ से किया जा सकता है | 
          श्री अंगारेश्वर पर मंगल पूजा (भात पूजन), मंगल ग्रह के लिए समर्पित है | मंगलदोष शांति पूजा ऋण, गरीबी और त्वचा की समस्याओं से राहत के लिए लाभकारी है | इन कार्यों के परिणाम के लिए सक्षम हो हमें और अधिक गहरा आध्यात्मिक पूजा द्वारा लागू ऊर्जा आत्मसात करने के लिए मंगलदेव की भात पूजा श्री अंगारेश्वर महादेव (उज्जैन, मध्यप्रदेश) पर करने की ज़रूरत है | 

मंगलदोष निवारण के लिए इनका करें दान--- मूंगा, गेहूं, मसूर, लाल वस्त्र, कनेर पुष्प, गुड़, तांबा,लाल चंदन, केसर.
Edited by: Editor

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Editor In Chief : Dr. Umesh Sharma
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