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जानिए आपकी जन्म कुंडली के राहु और वास्तु दोष का सम्बन्ध

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       सामान्य प्रचलित धारणा के अनुसार यदि कुंडली मेँ सात ग्रह (सूर्य, चंद्र, मंगल ,बुध ,गुरु, शुक्र और शनि ) जब राहु केतु के बीच स्थित हो जाते हैँ तो कालसर्प योग माना जाता हैं या बनता है ।। 
Know-your-horoscope-Rahu-and-architectural-defects-relations-जानिए आपकी जन्म कुंडली के राहु और वास्तु दोष का सम्बन्ध      पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार समान्यतः यदि किसी जातक( व्यक्ति) की जन्मकुंडली मेँ कालसर्प योग होता है तो उसे जिंदगी भर संघर्ष और कठिनाई से गुजरना पड़ता है व्यक्ति को जिंदगी भर काम काज स्वास्थ्य नौकरी व्यवसाय संबंधित परेशानी का सामना करना पड़ता है और ऐसी परिस्थिति में उसे ज्योतिर्विद कालसर्प योग/दोष पूजा का सलाह देते हैँ लेकिन 90 प्रतिशत जातक कहते हैँ कि पूजा से लाभ नहीँ हुआ और जीवन मेँ संघर्ष बरकरार है और इसका कारण समझ नहीं पाते है।। परन्तु पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इसका प्रमुख कारण होता है व्यक्ति की जन्मकुंडली मे कालसर्प योग होने की वजह से उत्पन्न हुआ उसके घर मे वास्तु दोष।। 
 कालसर्प योग की वजह से घर में निन्नलिखित वास्तु दोष पाए जाते हैँ---- 
  1. घर का मुख्य द्वार दक्षिण पूर्व और दक्षिण दक्षिण पूर्व के बीच होना, उत्तर पूर्व और पूर्व उत्तर पूर्व के बीच होना, पश्चिम उत्तर पश्चिम में होना , उत्तर उत्तर पश्चिम मे होना।। 
  2. घर का नॉर्थ ईस्ट मेँ शौचालय ,किचन , सीढ़ियाँ या उत्तर पूर्व का कटा होना।। 
  3. दक्षिण पश्चिम मेँ शौचालय का होना और साउथ का नीचा होना या पूजा घर गलत जगह पर होना साथ साथ ही ब्रह्म स्थान में भी वास्तुदोष होना । 

       पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब कोई व्यक्ति घर खरीदता है या किराए पर घर लेता है तो उस व्यक्ति को घर उस के ग्रहोँ के अनुसार ही मिलते हैँ यानी अगर जन्म कुंडली मेँ ग्रह की स्थिति खराब है तो उसके घर मेँ वास्तुदोष निश्चित ही पाए जाते हैँ ।। अगर जन्म कुंडली मेँ राहु खराब हो और जैसी स्थिति राहु की होगी घर मेँ टॉयलेट उसी जगह पर होता है और राहु के बुरे स्थिति होने की वजह से राहु की दशा अंतर्दशा मेँ व्यक्ति को दोहरा कष्ट झेलना पड़ता है ।। कई बार कुछ व्यक्ति ऐसे आते हैँ इनकी कुंडली में बहुत सारे ग्रहो की स्थिति अच्छी होती है फिर भी उनकी जीवन मेँ सफलता प्राप्ति नहीं होती इसका प्रमुख कारण है घर में वास्तु दोष का होना ।। हमारे वेदिक ज्योतिष ग्रन्थ एवम् ज्योतिर्विद ग्रहोँ की उपाय तो सही बताते हैँ लेकिन घर में वास्तु दोष होने के कारण उससे लाभ नहीँ मिलता और लोगो का ज्योतिष और उसके प्रभाव से विश्वास उठने लगता है बिना कारण या वजह जाने।। 
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जानिए पूजन में दीपक का महत्त्व एवम् प्रकार-- =================== 
इस चराचर जगत में जीवन जीने के लिए प्राणि मात्र को प्रकाश चाहिए। बिना प्रकाश के वह कोई भी कार्य नहीं कर सकता। सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रकाश सूर्य का है। इसके प्रकाश में अन्य सभी प्रकाश समाए रहते हैं। इसीलिए कहा गया है-- 
 शुभं करोति कल्याण आरोग्यं सुख संपदम्। 
 शत्रु बुद्धि विनाशं च दीपज्योतिः नमोस्तुते। 
      पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिस व्यक्ति के हाथ में सूर्य रेखा स्पष्ट, निर्दोष तथा बलवान होती है या कुंण्डलीमें सूर्य की स्थिति कारक, निर्दोष तथा बलवान होती है, वह धनवान, कीर्तिवान, ऐश्वर्यवान होता है और दूसरे के मुकाबले भारी पड़ता है। वह बुराई से दूर रहता है। इसलिए पूजा पाठ में पहले ज्योति जलाकर प्रार्थना की जाती है कि कार्य समाप्ति तक स्थिर रह कर साक्षी रहें। पूजन के समय देवताओं के सम्मुख दीप उनके तत्व के आधार पर जलाए जाते हैं | 
         देवी मां भगवती के लिए तिल के तेल का दीपक तथा मौली की बाती उत्तम मानी गई है। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए देशी घी का दीपक जलाना चाहिए। वहीं शत्रु का दमन करने के लिए सरसों व चमेली के तेल सर्वोत्तम माने गए हैं। देवताओं के अनुकूल बत्तियों को जलाने का भी योग है| भगवान सूर्य नारायण की पूजा एक या सात बत्तियों से करने का विशेष महत्व है वहीं माता भगवती को नौ बत्तियों का दीपक अर्पित करना सर्वोत्तम कहा गया है। हनुमान जी एवं शंकरजी की प्रसन्नता के लिए पांच बत्तियों का दीपक जलाने का विधान है। इससे इन देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। अनुष्ठान में पांच दीपक प्रज्वलित करने का महत्व अनूठा है- सोना, चांदी, कांसा, तांबा, लौहा। 
       पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दीपक जलाते समय उसके नीचे सप्तधान्य (सात प्रकार का अनाज) रखने से सब प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यदि दीपक जलाते समय उसके नीचे गेहू रखें तो धन-धान्य की वृद्धि होगी। यदि दीपक जलाते समय उसके नीचे चावल रखें तो महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी। इसी प्रकार यदि उसके नीचे काले तिल या उड़द रखें तो स्वयं मां काली भैरव, शनि, दस दिक्पाल, क्षेत्रपाल हमारी रक्षा करेंगे। इसलिए दीपक के नीचे किसी न किसी अनाज को रखा जाना चाहिए। साथ में जलते दीपक के अंदर अगर गुलाब की पंखुड़ी या लौंग रखें, तो जीवन अनेक प्रकार की सुगंधियों से भर उठेगा। यहाँ विभिन्न धातुओं के दीपकों का महत्व एवम् प्रभाव का उल्लेख किया जा रहा है जिन्हें जलाने से उनसे संबद्ध मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 
  1.  सोने का दीपक:---- सोने के दीपक को वेदी के मध्य भाग में गेहूं का आसन देकर और चारों तरफ लाल कमल या गुलाब के फूल की पंखुड़ियां बिखेर कर स्थापित करें। इसमें गाय का शुद्ध घी डालें तथा बत्ती लंबी बनाएं और इसका मुख पूर्व की ओर करें। सोने के दीपक में गाय का शुद्ध घी डालते हैं तो घर में हर प्रकार की उन्नति तथा विकास होता है। इससे धन तथा बुद्धि में निरंतर वृद्धि होती रहेगी। बुद्धि सचेत बुरी वृत्तियों से सावधान करती रहेगी तथा धन सही स्रोतों से प्राप्त होगा। 
  2.  चांदी का दीपक:--- पूजन में चांदी के दीपक को चावलों का आसन देकर सफेद गुलाब या अन्य सफेद फूलों की पंखुड़ियों को चारों तरफ बिखेर कर पूर्व दिशा में स्थापित करें। इसमें शुद्ध देशी घी का प्रयोग करें। चांदी का दीपक जलाने से घर में सात्विक धन की वृद्धि होगी। 
  3.  तांबे का दीपक:---- तांबे के दीपक को लाल मसूर की दाल का आसन देकर और चारों तरफ लाल फूलों की पंखुड़ियों को बिखेर कर दक्षिण दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें और बत्ती लंबी जलाएं। तांबे के दीपक में तिल का तेल डालने से मनोबल में वृद्धि होगी तथा अनिष्टों का नाश होगा। 
  4.  कांसे का दीपक:---- कांसे के दीपक को चने की दाल का आसन देकर तथा चारों तरफ पीले फूलों की पंखुड़ियां बिखेर कर उत्तर दिशा में स्थापित करें। इसमें तिल का तेल डालें। कांसे का दीपक जलाने से धन की स्थिरता बनी रहती है। अर्थात जीवन पर्यन्त धन बना रहता है। 
  5.  लोहे का दीपक:---- लोहे के दीपक को उड़द दाल का आसन देकर चारों तरफ काले या गहरे नीले रंग के पुष्पो की पंखुड़ियां बिखेर कर पश्चिम दिशा में स्थापित करें। इसमें सरसों का तेल डालें। लोहे के दीपक में सरसों के तेल की ज्योति जलाने से अनिष्ट तथा दुर्घटनाओं से बचाव हो जाता है।

 जानिए कैसे करें ग्रहों की पीड़ा निवारण हेतु दीपक का प्रयोग :---- 
 पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिस प्रकार पूजा में नवग्रहों को अंकित किया जाता है वैसे ही चौकी( बाजोट या पाटिया) के मध्य में सोने के दीपक को रखा जाता है। सोने के दीपक में सूर्य का वास होता है। सबसे पहले इसकी चैकी को तांबे में मढ़वाने का अर्थ है शरीर में रंग की शुद्धता तथा प्रचुरता क्योंकि तांबे में मंगल का वास है और शरीर में मंगल खून का नियंत्रक है। 
       इसी तरह दीपकों को चैकी पर रखने का क्रम है। जिस प्रकार पूजा क्रम में सूर्य मंडल को मध्य में रखकर पूजा की जाती है और माना जाता है कि सूर्य के चारों तरफ आकाश में उससे आकर्षित होकर सभी ग्रह उसकी परिक्रमा करते रहते हैं और उपग्रह अपने ग्रह के साथ सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं। उसी प्रकार अन्य दीपक सोने के दीपक के चारों तरफ स्थापित किए जाते हैं। मिट्टी या आटे का दीपक एक बार जलकर अशुद्ध हो जाता है। उसे दोबारा प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।। यह दीपक पीपल एवं क्षेत्रपाल के लिए विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इन पांच दीपकों को जलाने से सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं साथ ही अन्य देवता प्रसन्न होते हैं। इससे तीनों बल बुद्धिबल, धनबल और देहबल की वृद्धि होती है और विघ्न बाधाएं दूर हो जाती हैं। इस प्रकार यह दीप ज्योति जहां जप पूजा की साक्षी होती है, वहीं वह जीवन में इतना उपकार भी करती है कि जातक ग्रह की कृपा प्राप्त कर लेता है।।। 
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जानिए आपके लग्न अनुसार आपका मारकेश कोन होगा ??? 
 सामान्य प्रचलित धरना अनुसार किसी जातां की जन्मकुण्डली में जो ग्रह मृत्यु या मृत्यु के समान कष्ट दें उन्हें मारकेश कहा जाता है। पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आप स्वयं अपनी जन्मकुंडली देखकर जान सकते है कि कौन सा ग्रह अपनी दशा में मारकेश का रूप लेंगे। कैसे ..??? 
 जानिए आपकी जन्मकुंडली के लग्नानुसार अपना मारकेश---- 
  1.  मेष लग्न- मेष लग्न में स्थित शुक्र दूसरे एंव सातवें भाव का मालिक है, किन्तु फिर भी जातक के जीवन को समाप्त नहीं करेगा। यह गम्भीर व्याधियों को जन्म दे सकता है। मेष लग्न में शनि दशवें और ग्यारहवें भाव का अधिपति होकर भी अपनी दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट देगा। 
  2.  वृष लग्न -वृष लग्न में स्थित मंगल सातवें एंव बारहवें भाव का मालिक होता है जबकि बुध दूसरे एंव पांचवें भाव का अधिपति होता है। वृष लग्न में शुक्र, गुरू व चन्द्र मारक ग्रह माने जाते है। 
  3.  मिथुन लग्न ----मिथुन लग्न में चन्द्र व गुरू दूसरे एंव सातवें भाव के अधिपति है। चन्द्रमा प्रतिकूल स्थिति में होने पर भी जातक का जीवन नष्ट नहीं करता है। मिथुन लग्न में बृहस्पति और सूर्य मारक बन जाते है। 
  4.  कर्क लग्न--- कर्क लग्न में शनि सातवें भाव का मालिक होकर भी कर्क के लिए कष्टकारी नहीं होता है। सूर्य भी दूसरे भाव का होकर जीवन समाप्त नहीं करता है। लेकिन कर्क लग्न में शुक्र ग्रह मारकेश होता है। 
  5.  सिंह लग्न ----सिंह लग्न में स्थित शनि सप्तमाधिपति होकर भी मारकेश नहीं होता है जबकि बुध दूसरे एंव ग्यारहवें भाव अधिपति होकर जीवन समाप्त करने की क्षमता रखता है। 
  6.  कन्या लग्न----कन्या लग्न में स्थित सूर्य बारहवें भाव का मालिक होकर भी मृत्यु नहीं देता है। यदि द्वितीयेश शुक्र , सप्तमाधिपति गुरू तथा एकादश भाव का स्वामी पापक्रान्त हो तो मारक बनते है किन्तु इन तीनों में कौन सा ग्रह मृत्यु दे सकता है। इसका स्क्षूम विश्लेषण करना होगा। 
  7.  तुला लग्न --- तुला लग्न में स्थित दूसरे और सातवें भाव का मालिक मंगल मारकेश नहीं होता है, परन्तु कष्टकारी पीड़ा जरूर देता है। इस लग्न में शुक्र और गुरू यदि पीडि़त हो तो मारकेश बन जाते है। 
  8.  वृश्चिक लग्न ---यहाँ स्थित गुरू दूसरे भाव का मालिक होकर भी मारकेश नहीं होता है। यदि बुध निर्बल, पापक्रान्त हो अथवा अष्टम, द्वादश, या तृतीय भावगत होकर पापग्रहों से युक्त हो जाये तो मारकेश का रूप ले लेगा। 
  9.  धनु लग्न --- यहाँ स्थित शनि द्वितीयेश होने के उपरान्त भी मारकेश नहीं होता है। बुध भी सप्तमेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। शुक्र निर्बल, पापक्रान्त एंव क्रूर ग्रहों के साथ स्थिति हो तो वह मारकेश अवश्य बन जायेगा। 
  10.  मकर लग्न ---मकर लग्न में स्थित शनि द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है क्योंकि शनि लग्नेश भी है। सप्तमेश चन्द्रमा भी मारकेश नहीं होता है। मंगल एंव गुरू यदि पापी या अशुभ स्थिति में है तो मारकेश का फल देंगे। 
  11.  कुम्भ लग्न ---यहाँ स्थित बृहस्पति द्वितीयेश होकर मारकेश है किन्तु शनि द्वादशेश होकर भी मारकेश नहीं है। मंगल और चन्द्रमा भी यदि पीडि़त है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है। 
  12.  मीन लग्न -- यहाँ स्थित मंगल द्वितीयेश होकर भी मारकेश नहीं होता है। मीन लग्न में शनि और बुध दोनों मारकेश सिद्ध होंगे। अष्टमेश सूर्य एंव षष्ठेश शुक्र यदि पापी है और अशुभ है तो मृत्यु तुल्य कष्ट दे सकते है।।
Edited by: Editor

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Editor In Chief : Dr. Umesh Sharma
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