Ads By Google info

ताजा खबरें
Loading...
विज्ञापन
Ads By Google info

अनमोल विचार

Subscribe Email

ताजा लेख आपके ईमेल पर



पसंदीदा लेख

जानिए महाशिवरात्रि महात्म्य व पूजा विधान

print this page
 Know-the-majesty-and-worship-legislation-Shivaratri-2017-india-जानिए महाशिवरात्रि 2017 महात्म्य व पूजा विधान

       शिव यानि कल्याणकारी, शिव यानि बाबा भोलेनाथ, शिव यानि शिवशंकर, शिवशम्भू, शिवजी, नीलकंठ, रूद्र आदि। हिंदू देवी-देवताओं में भगवान शिव शंकर सबसे लोकप्रिय देवता हैं, वे देवों के देव महादेव हैं तो असुरों के राजा भी उनके उपासक रहे। आज भी दुनिया भर में हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये भगवान शिव पूज्य हैं। 
 ---------------------------------------------------------------------------------------- 
  • महाशिवरात्रि 2017 में 24 फरवरी--- 
  • निशिथ काल पूजा- 24:08 से 24:59 
  • पारण का समय- 06:54 से 15:24 (25 फरवरी) 
  • चतुर्दशी तिथि आरंभ- 21:38 (24 फरवरी) 
  • चतुर्दशी तिथि समाप्त- 21:20 (25 फरवरी) 

------------------------------------------------------------------- 
         हिंदु शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव मनुष्य के सभी कष्टों एवं पापों को हरने वाले हैं। सांसरिक कष्टों से एकमात्र भगवान शिव ही मुक्ति दिला सकते हैं। इस कारण प्रत्येक हिंदु मास के अंतिम दिन भगवान शिव की पूजा करके जाने-अनजाने मे किए हुए पाप कर्म के लिए क्षमा मांगने और आने वाले मास में भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का प्रावधान है। शास्त्रों के अनुसार, शुद्धि एवं मुक्ति के लिए रात्री के निशीथ काल में की गई साधना सर्वाधिक फलदायक होती है। अत: इस दिन रात्री जागरण करके निशीथ काल में भगवान शिव कि साधना एवं पूजा करने का अत्यधिक महत्व है।
            महाशिवरात्री वर्ष के अंत में आती है अत: इसे महाशिवरात्री के रूप में मनाया जाता है एवं इस दिन पूरे वर्ष में हुई त्रुटियों के लिए भगवान शंकर से क्षमा याचना की जाती है तथा आने वाले वर्ष में उन्नति एवं सदगुणों के विकास के लिए प्रार्थना की जाती है। महाशिवरात्रि का महा उत्सव फाल्गुड मास की त्रिद्रशी के दिन मनाई जाती है। मान्यता है की महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर ही भोलेनाथ और माता पार्वती विवाह के पावन सुत्र में बंधे थे, कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि इस दिन महादेव ने कालकूट नाम का विष पान कर अपने कंठ में रख लिया था कहा जाता है कि यह विष सागर मंथन में निकला था। शिवरात्रि के ही दिन बहुत समय पहले एक शिकारी को दर्शन देकर उसे पापो से मुक्त किया था। महाशिवरात्रि के इस पवित्र अवसर से एक पौराणिक कथा भी जुडी हैं। प्राचीन काल में, एक जंगल में गुरूद्रूह नाम के एक शिकारी रहते थे जो जंगली जानवरों के शिकार करके वह अपने परिवार का पालन-पोषण किया करते थे। 
           एक बार शिवरात्रि के दिन ही जब वह शिकार के लिए गया, तब संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई जानवर शिकार के लिए न मिला, चिंतित हो कर कि आज उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पडेगा, वह सूर्यास्त होने पर भी एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे एक पेड पर अपने साथ थोडा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ गया क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहां ज़रूर आयेगा। वह पेड "बेल-पत्र" का था और इसके नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढक जाने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था। 
           रात का पहला प्रहर बीतने से पहले ही एक हिरणी वहां पर पानी पीने के लिए आई। उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा। ऎसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदे पे़ड के नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गई। हिरणी ने जब पत्तों की खडखडाहट सुनी, तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर, शिकारी से, कांपते हुए बोली- "मुझे मत मारो।" शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड सकता। हिरणी ने शपथ ली कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी। तब वह उसका शिकार कर ले। शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है।
              समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है। शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने "जल्दी लौटना" कहकर ,उस हिरनी को जाने दिया। थोडी ही देर गुजरी कि एक और हिरनी वहां पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो, तीर सांधने लगा और ऎसा करते हुए, उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई। इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर, हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है, उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है। उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया। 
              अब तो वह इसी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि उन में से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा। इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर वनेचर (शिकारी ) को बडा हर्ष हुआ, अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वत: ही संपन्न हो गई लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज़ से वह हिरन सावधान हो गया। उसने व्याध (शिकारी ) को देखा और पूछा क्या करना चाहते हो। वह बोला-अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा। वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा कि मैं धन्य हूं कि मेरा ये ह्वष्ट-पुष्ट शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा लेकिन एक बार मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहां लौट आऊं। शिकारी का ह्रदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह कुछ विनम्र वाणी में बोला कि जो-जो यहां आये, सभी बातें बनाकर चले गये और अब तक नहीं लौटे, यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे, तो मेरे परिजनों का क्या होगा। 
               अब हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता। व्याध ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि "शीघ्र लौट आना।" रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू होते ही उस वनेचर के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था। उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गई अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा, "ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने कुटुंब का पालन करता रहा। अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा सब मृगों को यह कहकर कि "वे धन्य हैं"। वापिस जाने दिया। उसके ऎसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर गुह" नाम प्रदान किया। यह वही गुह थे जिनके साथ भगवान् श्री राम ने मित्रता की थी। अत: यह भी माना जाता है कि, शिवरात्री के दिन व्रत करने से सारे पाप से मुक्त हो जाते है और महादेव का दर्शन कर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
 ==================================================================== 
इस वर्ष महाशिवरात्री का त्योहार (शुक्रवार) 24 फरवरी 2017के दिन मनाया जाएगा। हिंदु कलेंडर के अनुसार एक वर्ष में बारह शिवरात्रियां होतीं हैं। शिवरात्रि प्रत्येक हिन्दु माह की कृष्ण चतुर्दशी, जो कि माह का अंतिम दिन होता है के दिन मनाई जाती है। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी, महाशिवरात्री के रूप में, पूरे भारतवर्ष में धूम-धाम से मनाई जाती है। इसके दूसरे दिन से हिंदु वर्ष के अंतिम मास फाल्गुन का आरंभ हो जाता है। 
---------------------------------------------------------------------------------------- 
           ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शंकर एवं मां पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था तथा इसी दिन प्रथम शिवलिंग का प्राकट्य हुआ था। शिव रात्री के दिन भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस दिन शिव भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, भगवान शिव का अभिषेक करते हैं तथा पंचक्षरी मंत्र का जाप करतें हैं। भगवान शिव सब देवों में वृहद हैं, सर्वत्र समरूप में स्थित एवं व्यापक हैं। इस कारण वे ही सबकी आत्मा हैं। भगवान शिव निष्काल एवं निराकार हैं। भगवान शिव साक्षात ब्रह्म का प्रतीक है तथा शिवलिंग भगवान शंकर के ब्रह्म तत्व का बोध करता है। इसलिए भगवान शिव की पूजा में निष्काल लिंग का प्रयोग किया जाता है। सारा चराचर जगत बिन्दु नाद स्वरूप है। 
        बिन्दु देव है एवं नाद शिव इन दोनों का संयुक्त रूप ही शिवलिंग है। बिन्दु रूपी उमा देवी माता है तथा नाद स्वरूप भगवान शिव पिता हैं। जो इनकी पूजा सेवा करता है उस पुत्र पर इन दोनों माता-पिता की अधिकाधिक कृपा बढ़ती रहती है। वह पूजक पर कृपा करके उसे अतिरिक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। आंतरिक आनंद की प्राप्ति के लिए शिवलिंग को माता-पिता के स्वरूप मानकर उसकी सदैव पूजा करनी चाहिए। भगवान शिव प्रत्येक मनुष्य के अंतःकरण में स्थित अवयक्त आंतरिक अधिस्ठान तथा प्रकृति मनुष्य की सुव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान है। नमः शिवाय: पंचतत्वमक मंत्र है इसे शिव पंचक्षरी मंत्र कहते हैं। इस पंचक्षरी मंत्र के जप से ही मनुष्य सम्पूर्ण सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।
         इस मंत्र के आदि में ॐ लगाकर ही सदा इसके जप करना चाहिए। भगवान शिव का निरंतर चिंतन करते हुए इस मंत्र का जाप करें। सदा सब पर अनुग्रह करने वाले भगवान शिव का बारंबार स्मरण करते हुए पूर्वाभिमुख होकर पंचक्षरी मंत्र का जाप करें। भक्त की पूजा से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। शिव भक्त जितना जितना भगवान शिव के पंचक्षरी मंत्र का जप कर लेता है उतना ही उसके अंतकरण की शुद्धि होती जाती है एवं वह अपने अंतकरण मे स्थित अव्यक्त आंतरिक अधिष्ठान के रूप मे विराजमान भगवान शिव के समीप होता जाता है। उसके दरिद्रता, रोग, दुख एवं शत्रुजनित पीड़ा एवं कष्टों के अंत हो जाता है एवं उसे परम आनंद कि प्राप्ति होती है। भगवान शिव की पूजा आराधना की विधि बहुत सरल मानी जाती है।
           माना जाता है कि शिव को यदि सच्चे मन से याद कर लिया जाये तो शिव प्रसन्न हो जाते हैं। उनकी पूजा में भी ज्यादा ताम-झाम की जरुरत नहीं होती। ये केवल जलाभिषेक, बिल्वपत्रों को चढ़ाने और रात्रि भर इनका जागरण करने मात्र से मेहरबान हो जाते हैं। वैसे तो हर सप्ताह सोमवार का दिन भगवान शिव की आराधना का दिन माना जाता है। हर महीने में मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है लेकिन साल में शिवरात्रि का मुख्य पर्व जिसे व्यापक रुप से देश भर में मनाया जाता है दो बार आता है। एक फाल्गुन के महीने में तो दूसरा श्रावण मास में। फाल्गुन के महीने की शिवरात्रि को तो महाशिवरात्रि कहा जाता है। इसे फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालु कावड़ के जरिये गंगाजल भी लेकर आते हैं जिससे भगवान शिव को स्नान करवाया जाता हैं।
 ========================================================================
जानिए महाशिवरात्रि महात्म्य व पूजा विधान 
       सत्य ही शिव हैं और शिव ही सुंदर है।तभी तो भगवान आशुतोष को सत्यम शिवम सुंदर कहा जाता है।दोस्तों भगवान शिव की महिमा अपरंपार है,जो जल्द ही प्रसन्न होने वाले हैं।भोलेनाथ को प्रसन्न करने का ही महापर्व है...शिवरात्रि...जिसे त्रयोदशी तिथि, फाल्गुण मास, कृ्ष्ण पक्ष की तिथि को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है।महाशिवरात्रि के महान पर्व की विशेषता है कि सनातन धर्म के सभी प्रेमी इस त्योहार को मनाते हैं। महाशिवरात्रि के दिन भक्त जप,तप और व्रत रखते हैं और इस दिन भगवान के शिवलिंग रुप के दर्शन करते हैं।इस पवित्र दिन पर देश के हर हिस्सों में शिवालयों में बेलपत्र, धतूरा, दूध,दही, शर्करा आदि से शिव जी का अभिषेक किया जाता है।देश भर में महाशिवरात्रि को एक महोत्सव के रुप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था।महाशिवरात्रि का महात्योहार हर्ष और उल्लास का महापर्व है। 
महाशिवरात्रि व्रत महात्म्य--- 
 हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले साधक को मोक्ष की प्राप्ती होती है।जगत में रहते हुए मुष्य का कल्याण करने वाला व्रत है महाशिवरात्रि। आज के दिन व्रत रखने से साधक के सभी दुखों,पीड़ाओं का अंत तो होता ही है साथ ही मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है। कहने का मतलब है कि शिव की सादना से धन-धान्य, सुख-सौभाग्य,और समृ्द्धि की कमी कभी नहीं होती। भक्ति और भाव से स्वत: के लिए तो करना ही चाहिए सात ही जगत के कल्याण के लिए भगवान आशुतोष की आराधना करनी चाहिए।मनसा...वाचा...कर्मणा हमें शिव की आराधना करनी चाहिए।
       भगवान भोलेनाथ..नीलकण्ठ हैं, विश्वनाथ है। हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रदोषकाल यानि सूर्यास्त होने के बाद रात्रि होने के मध्य की अवधि,मतलब सूर्यास्त होने के बाद के 2 घंटे 24 मिनट कि अवधि प्रदोष काल कहलाती है। इसी समय भगवान आशुतोष प्रसन्न मुद्रा में नृ्त्य करते है।इसी समय सर्वजनप्रिय भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यही वजह है, कि प्रदोषकाल में शिव पूजा या शिवरात्रि में अवघड़दानी भगवान शिव का जागरण करना विशेष कल्याणकारी कहा गया है। 
        हमारे सनातन धर्म में 12 ज्योतिर्लिंग का वर्णन है।कहा जाता है कि प्रदोष काल में महाशिवरात्रि तिथि में ही सभी ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था।
 महाशिवरात्रि व्रत: विधि व पूजा विधान--- 
 महाशिवरात्रि का व्रत हमसब के लिए है। भोले भंडारी तो सबसे लिए निराले हैं...जिनकी महिमा का गुणगान जितना भी किया जाए उतना ही कम है।भोले तो अपने साधकों से पान फूल से भी प्रसन्न हो जाते हैं।बस भाव होना चाहिए। इस व्रत को जनसाधारण स्त्री-पुरुष , बच्चा, युवा और वृ्द्ध सभी करते है। धनवान,हो या निर्धन,श्रद्धालू अपने सामर्थ्य के अनुसार इस दिन रुद्राभिषेक और यज्ञ करते हैं,पूजन करते हैं।और भाव से भगवान आशुतोष को प्रसन्न करने का सहर संभव प्रयास करते हैं। 
         महाशिवरात्रि का ये महाव्रत हमें प्रदोषनिशिथ काल में ही करना चाहिए। जो व्यक्ति इस व्रत को पूर्ण विधि-विधान से करने में असमर्थ हो, उन्हें रात्रि के प्रारम्भ में तथा अर्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन अवश्य करना चाहिए। व्रत करने वाले पुरुष को शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान व नित्यकर्म से निवृत्त होकर ललाट पर भस्मका त्रिपुण्ड्र तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण कर शिवालय में जाना चाहिए और शिवलिंग का विधिपूर्वक पूजन एवं भगवान शिव को प्रणाम करना चाहिये।
       तत्पश्चात्‌ उसे श्रद्धापूर्वक महाशिवरात्रि व्रत का इस प्रकार संकल्प करना चाहिये- 
 शिवरात्रिव्रतं ह्यतत्‌ करिष्येऽहं महाफलम्‌। निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते॥ 
    महाशिवरात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान व `ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करना चाहिए। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके `ओम हीं अधोराय नम:’ का जाप व तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र `ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं `ओम हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए।
 महाशिवरात्रि मंत्र एवं समर्पण--- 
महाशिवरात्रि पूजा विधान के समय ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप अवश्य करना चाहि‌ए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ’समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करनी चाहिए। पश्चात कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर महाशिवरात्रि पूजन कर्म शिवार्पण करने का विधान हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है।
          अंतत: महाशिवरात्रि व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहि‌ए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है,साथ ही भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।भगवान भोलेनाथ,महादेव,आशुतोष आप सभी की समस्त मनोकामनाओं को पूरा करें।। 
 जानिए क्यों कहते हैं शिवरात्रि/कालरात्रि -- 
 रात्रि शब्द अज्ञान अन्धकार से होने वाले नैतिक पतन का द्योतक है। परमात्मा ही ज्ञानसागर है जो मानव मात्र को सत्यज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री-पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध सभी इस व्रत को कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सवेरे स्नानादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता है। शिवरात्रि शब्द का प्रयोग इसलिए करते है क्यूंकि शिव बाबा का अवतरण(आना) घोर संकट के समय में हुआ है , जब 5 विकार जिनको माया (5 विकारों के समूह को माया कहते है) कहा जाता है समाज मे हर जगह 100% होते है. इन 5 विकारों से हम सबको छुड़ाने के लिए शिव बाबा धरा पर आते है और उनके आने की ख़ुशी मे शिवरात्रि का त्योहार हर साल बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। 
     माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया।
Edited by: Editor

आपके विचार

हिंदी में यहाँ लिखे
Ads By Google info

वास्तु

हस्त रेखा

ज्योतिष

फिटनेस मंत्र

चालीसा / स्त्रोत

तंत्र मंत्र

निदान


ऐसा भी होता है?

धार्मिक स्थल

 
Editor In Chief : Dr. Umesh Sharma
Copyright © Asha News . For reprint rights: ASHA Group
My Ping in TotalPing.com www.hamarivani.com रफ़्तार www.blogvarta.com BlogSetu