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जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)

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रूद्राक्ष (रूद्र मतलब शिव, अक्ष मतलब आंसु इसलिए रूद्र अधिक अक्ष मतलब शिव के आंसु) विज्ञान में उसे म्संमवबंतचने ळंदपजतें त्वगइ के नाम से जाना जाता हैं, जो एक तरह का (फल) बीज हैं । जो कि एशिया खंड के कुछ भागों में जैसे की इंडोनेशिया, जावा, मलेशिया, भारत, नेपाल, श्रीलंका और अंदमान-निकोबार में पाये जाते हैं । कई वैज्ञानिको ने अपने लंबे प्रयोगात्मक अभ्यास के बाद कबूल किया हैं कि इस चमत्कारी बीज के कई फायदे हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिव, अध्यात्मिक और कई वैद्यकीय खूबीयां हैं जो इसके पहनने वाले को जीवन के कई कार्यक्षेत्र (जैसे की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) में मदद रूप होता हैं । कई पुराण, शास्त्रों और आयुर्वेदिय शास्त्रों में रूद्राक्ष के फायदे और महत्ता का तलस्पर्शीय वर्णन किया गया हैं । आज कई हजार सालो से राजा, साधु-संत और ऋषिमुनि रूद्राक्ष की पूजा करते आ रहे हैं और उसे पहनते आये हैं । 
जानिए कैसे करें रूद्राक्ष द्वारा अपने रोग/बीमारी दूर करने में उपयोग ( रुद्राक्ष द्वारा विभिन्न रोगों की चिकित्सा)-Learn-how-to-use-Rudraksh-to-remove-his-disease-Rudraksh-treatment-of-various-diseases--       कहते हैं रूद्राक्ष पहनने वाले को अध्यात्मिक रूप में कई फायदे होते हैं, उससे संपत्ति और ख्याति भी बढ़ती हें ओर कई भौतिक सुख भी प्राप्त होते हैं । रूद्राक्ष या रूद्राक्षमाला पहनने से पहले जरूरी हैं कि किसी रूद्राक्ष थेयायिस्ट, ज्योतिषि, वैदिक अभ्यासु, आयुर्वेदिक डॉक्टर या फिर किसी ऐसे व्यक्ति जिसने रूद्राक्ष धारण किया हो । उनसे उनके अनुभवों को जान लेना जरूरी हैं ताकि रूद्राक्ष से होने वाले फायदों ाक रूद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति पूरी तरह लाभ उठा सके । रूद्राक्ष के दर्शन से लक्ष पुण्य, स्पर्श से कोटि-प्रमाण पुण्य, धारण करने से दशकोटि-प्रमाण पुण्य एवं इससे जप करने से लक्ष कोटि सहस्त्र तथा लक्ष कोटि शत-प्रमाण पुण्य की प्राप्ति होती हैं। श्री मद्देवीभागवत के अनुसार जिस प्रकार पुरूषों में विष्णु, ग्रहों में सूर्य, नदियों में गंगा, मुनियों में कश्यप, अश्व समूहों में उच्चैः श्रवा, देवों में शिव देवियों में गौरी (पार्वती) सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह रूद्राक्ष सभी में श्रेष्ठ हैं।  
रूद्राक्ष उत्पत्ति की कथा :- 
 स्कन्ध पुराण के अनुसार प्राचीन समय में पाताल लोक का राजा मय बड़ा ही बलशाली, शुरवीर, महापराक्रमी और अजय राजा था । एक बार उसके मन में लौभ आया और पाताल से निकलकर अन्य लोको पर विजय प्राप्त की जाए एैसा मन में विचार किया । विचार के अनुसार पाताल लोक के दानवों ने अन्य लोकों के ऊपर आक्रमण कर दिया और अपने बल के मद में चुर मय ने हिमालय पर्वत के तीनों श्रृंगों पर तीन पूल बनाए । जिनमें से एक सोने का, एक चॉदी का और एक लोहे का था । इस प्रकार सभी देवताओं के स्थान पर पाताल लोक के लोगों का वहां राज्य हो गया । 
       सभी देवतागण इधन-उधर गुफा आदि में छुपकर अपना जीवन व्यतित करने लगे । अन्त में सभी देवतागण ब्रह्माजी के पास गये और उनसे प्रार्थना की कि पाताल लोक के महापराक्रमी त्रिपुरासुरों से हमारी रक्षा करें । तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि त्रिपुरासुर इस समय महापराक्रमी हैं । समय और भाग्य उसका साथ दे रहा हैं । अतः हम सभी को त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु की शरण में चलना चाहिए । हमारा मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होगा । इस प्रकार ब्रह्माजी सहित समस्त देवगण विष्णु लोक पहुॅचकर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगें । देवगणों ने अपनी करूण कथा भगवान विष्णु को सुनाई और अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की । भगवान विष्णु ने भी ब्रह्माजी की तरह भगवान शिव की शरण में जाने को कहा । तत्प्श्चात सभी देवगण भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पहुॅचे वहां उन्होने प्रभु से शरण मांगी और अपने जीवन की रक्षा हेतु प्रार्थना की । 
     तब भगवान विष्णु और ब्रह्मा आदि सहित सभी देवतागण व स्वयं भगवान शिव पृथ्वी मंडल पर रथ को लेकर, तथा अपना धनुष बाण लेकर और स्वयं भगवान विष्णु दिव्य बाण बनकर भगवान शिव के सामने उपस्थित हुए । इस प्रकार भगवान शिव ने सागर स्वरूप तूणिर को बांध युद्ध के लिए रवाना हुए । त्रिपुरासुरों के नगर में पहुॅचकर भगवान शिव ने शुलमणी भगवान नारायण स्वरूप धारण कर अमोघ बाण को धनुष में चढ़ाकर निशाना साधते हुए त्रिपुरासुर पर प्रहार किया जिससे त्रिपुरासुरों के तीनों त्रिपुर के जलते ही हाहाकार मच गई । त्रिपुर के दाह के समय भगवान शिव ने अपने रोद्र शरीर को धारण कर लिया और अपनी युद्ध की थकान मिटाने हेतु सुन्दर शिखर पर विश्राम करने हेतु पहुॅचे । विश्राम के बाद भगवान शिव जोर-जोर से हंसने लगे । भगवान रूद्र के नेत्रों से चार ऑसु टपक पड़े। उन्हीं चार बूंद अश्रुओं के उस शेल शिखर पर गिर जाने से चार अंकुर पैदा हुए । समयानुसार अंकुर बड़े होने से कोई पत्र, पुष्प व फल आदि से हरे-भरे हो गये और रूद्र के अश्रुकणों से उत्पन्न ये वृक्ष रूद्राक्ष नाम से विख्यात हुए । 
 जानिए रूद्राक्ष और रूद्राक्ष माला पहनने के फायदे--- 
 1 रूद्राक्ष अथवा रूद्राक्षमाला मनकी चंचलता दूर करता हैं, शांति देता हैं, बेचैनी दूर करता हैं, आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान बढ़ाता हैं । 
 2 रूद्राक्ष में कई प्रकार के विटामिन हेते हैं जैसे कि विटामिन सी, जो रोगो से लड़ने वाली हमारे शरीर की प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाता हैं । रूद्राक्ष में इलेक्ट्रोमॅग्रेटिक तरंगे होती हैं, जो हमारे रूधिराभिसरण और रक्तचाप को काबू में रखता हैं । 
 3 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला की पूजा करने वाले और धारण करने वाले को रूद्राक्ष कालाजादू, मारण तंत्र, और बुरी आत्माओं से सुरक्षा प्रदान करता हैं । 
 4 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला पहननेवाले को रूद्राक्ष अकस्मात और अकुदरती मौत से बचाता हैं । 
 5 रूद्राक्ष-रूद्राक्षमाला हमारे अंदर की विषयवासना, लालच, क्रोध और अहंकार को दूर करता हैं, और हृदय को शुद्ध करता हैं । 
 6 मंत्र सिद्धि में रूद्राक्षमाला इन्सान की अंतरज्ञान शक्ति तथा अति इंद्रिय शक्ति को बढ़ाता हैं। सही नियमों का पालन करके किसी खास हेतु से पहना गया रूद्राक्ष इच्छित वस्तु या लक्ष्य पाने में काफी मदद करता हैं । 
===================================================================== आइये जाने विभिन्न रुद्राक्ष और उनके औषधीय गुण--- 
 एकमुखी रूद्राक्ष :- एकमुखी रूद्राक्ष साक्षात् शिव-स्वरूप हैं, इसके धारण करने से बड़े से बड़े पापों का नाश होता हैं, मनुष्य चिंतामुक्त और निर्भय हो जाता हैं, उसे किसी भी प्रकार की अन्य शक्ति और शत्रु से कोई कष्ट भय नहीं होता जो एकमुखी रूद्राक्ष को धारण और पूजन करता हैं, उसके यहॉ लक्ष्मी साक्षात् निवास करती हैं, स्थिर हो जाती हैं । रूद्राक्षों में एकमुखी रूद्राक्ष सर्वश्रेष्ठ, शिव स्वरूप सर्वकामना सिद्धि-फलदायक और मोक्षदाता हैं। एकमुखी रूद्राक्ष से संसार के सभी सुख सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं । अपने प्रभाव से यह रूद्राक्ष कंगाल को राजा बना सकता हैं ।
       सच्चा एकमुखी रूद्राक्ष किसी भी असम्भव कार्य को सम्भव कर सकता हैं किन्तु यह बात आमतौर पर बाजार में मिलने वाले एक मुखी काजु दाना (भद्राक्ष) पर लागु नहीं होती हैं । सूर्य दक्षिण-नेत्र, हृदय, मस्तिष्क, अस्थि इत्यादि का कारक हैं। यह ग्रह भगन्दर, स्नायु रोग, अतिसार, अग्निमंदता इत्यादि रोगों का भी कारक बनता हैं, जब यह प्रतिकूल बन जाता हैं, तब यह विटामिन ए और विटामिन डी को भी संचालित करता है, जिसकी कमी से निशान्धता (रात में न दिखाई देना), हड्डीयों की कमजोरी जैसे रोग उत्पन्न हाते हैं । इन सब के निवारण के लिए एकमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए क्योकिं सूर्यजनित दोषों के निवारण हेतु ज्योतिषी माणिक्य रत्न धारण करने का परामर्श देते हैं । सूर्य प्रतिकूल-स्थानीय होकर विभिन्न रोगों को जन्म देते हैं । नेत्र सम्बन्धी रोग, सिरदर्द, हृदयरोग, हड्डी के रोग, त्वचा रोग, उदर सम्बन्धी रोग, तेज बुखार, जैसे सभी रोगो के निवारण हेतु रूद्राक्ष माला के मध्य में एकमुखी रूद्राक्ष को पिरोकर धारण करना चाहिए। 
 दोमुखी रूद्राक्ष :-  दोमुखी रूद्राक्ष हर गौरी (अर्धनारीश्वर) स्वरूप हैं, इसे शिव-शिवा-रूप भी कहते हैं, दोमुखी रूद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप हैं, जिसके शरीर पर ये प्रतिष्ठित (धारण) होता हैं, उसके जन्म जन्मांतर के पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार अग्नि ईधन को जला डालती हैं । इस रूद्राक्ष का संचालन ग्रह चन्द्रमा (सोम) हैं । यह रूद्राक्ष हर प्रकार के रिश्तों में एकता बढ़ाता हैं, वशीकरण मानसिक शांति व ध्यान में एकग्रता बढ़ाता हैं । इच्छाशक्ति पर काबू, कुण्डली को जागृत करने में सहायता करता हैं । 
      स्त्री रोग जैसे गर्भाशय संबंधीत रोग शरीर के सभी प्रवाही और रक्त संबंधी बीमारियां, अनिद्रा, दिमाग, बांयी आँख की खराबी, खून की कमी, जलसम्बन्धी रोग, गुर्दा कष्ट, मासिक धर्म रोग, स्मृति-भ्रंश इत्यादि रोग होते हैं। इसके दुष्प्रभाव से दरिद्रता तथा मस्तिष्क विकार भी होते हैं । गुणों के हिसाब से यह मोती से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं। यह ग्रह हृदय, फेफडा, मस्तिष्क, वामनेत्र, गुर्दा, भोजन-नली, शरीरस्थ इत्यादि का कारक हैं। चन्द्रमा की प्रतिकूल स्थिति तथा दुष्प्रभाव के कारण हृदय तथा फेफड़ो की बीमारी होती हैं। 
तीनमुखी रूद्राक्ष : - तीनमुखी रूद्राक्ष ब्रह्मस्वरूप हैं। इसमें ब्रह्मा , विष्णु , महेश तीनों शक्तियों का समावेश है। इसका प्रधान ग्रह मंगल हैं। मंगल को ज्योतिषशास्त्र में सेनापति का दर्जा दिया गया हैं। यह अग्निरूप हैं। इसको धारण करने से आत्मविश्वास, निर्भयता, द्वेश, उच्चज्ञान, वास्तुदोष आदि में फायदा होता हैं । मंगल यदि किसी भी दुष्प्रभाव में होता हैं तो उसे रक्त रोग, हैजा, प्लेग, चेचक, रक्तचाप, शक्ति क्षीणता, नारी अंगरोग, अस्थिभ्रंश, बवासीर, मासिक धर्म रोग, अल्सर, अतिसार, चोट लगना और घाव आदि रोग होते है। मंगल ग्रह की प्रतिकूलता से उत्पन्न इन सभी रोगों के निदान और निवारण के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष आवश्यक रूप से धारण करना चाहिए। वृश्चिक और मेष राशि वालो के लिए तीनमुखी रूद्राक्ष अत्यन्त ही भाग्योदयकारी हैं।
 चारमुखी रूद्राक्ष : - चारमुखी रूद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप माना गया हैं। यह चार वेदों का रूप भी माना गया हैं। चारमुखी रूद्राक्ष के धारणकर्ता की आँखों में तेजस्विता , वाणी में मधुरता तथा शरीर में स्वास्थ्य एवं अरोग्यजनित कान्ति उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, उनके चतुर्दिक सम्मोहन का प्रभाव मण्डल निर्मित हो जाता है। यह रूद्राक्ष मन की एकाग्रता को बढाता हैं जो लेखक, कलाकार, विज्ञानी, विद्यार्थी और व्यापारियों को लाभकारी हैं । इसके प्रभाव से चपलता, चातुर्य और ग्रहण शक्ति में लाभ होता हैं । इस रूद्राक्ष पर बुध ग्रह का नियंत्रण होता हैं। 
     ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को युवराज कहा जाता है। यह नपुंसक तथा सौम्य ग्रह हैं। बुध ग्रह विद्या , गणित , ज्ञान, गाल ब्लाडर , नाड़ी संस्थान आदि का कारक हैं। इसकी प्रतिकुलता से अपस्मार , नाक, कान तथा गले के रोग, नपुंसकता, हकलाना, सफेद दाग, मानसिक रोग , मन की अस्थिरता, त्वचारोग, कोढ़, पक्षाघात पीतज्वर , नासिका रोग , दमा आदि रोग होते हैं। इन सभी के निदान के लिए चारमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभप्रद हैं। व्यापारियों और मिथुन तथा कन्या राशि वालो को चारमुखी रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। पन्ने की जगह चारमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पन्ने से कई गुना लाभ प्राप्त हो सकता हैं 
 पाँचमुखी रूद्राक्ष : - पाँचमुखी रूद्राक्ष स्वयं रूद्र स्वरूप हैं इसे कालाग्नि के नाम से भी जाना जाता है। यह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी माना जाता हैं। इससे यशोवृद्धि और वैभव सम्पन्नता आती हैं। इसका संचालन ग्रह बृहस्पति है। इसके उपयोग से मानसिक शांति, बुरी आदतों से छुटकारा, मंत्र सिद्धी, पवित्र विचार, व अधिक कामेच्छा पर काबू पाया जा सकता हैं । यह ग्रह धन , वैभव , ज्ञान , गौरव , मज्जा , यकृत , चरण , नितंब का कारक है। 
     बृहस्पति बुरे प्रभाव में हो तो व्यक्ति को अनेक तरह के कष्ट होते है। बृहस्पति स्त्री के लिए पति तथा पुरूष के लिए पत्नि का कारक हैं। अतः इसकी प्रतिकुलता से निर्धनता और दाम्पत्य सुख में विध्न उत्पन्न होता है तथा चर्बी की बिमारी , गुर्दा , जाँघ , शुगर और कान सम्बन्धी बीमारिया पैदा होती हैं। मोटापा, उदर गांठ, अत्यधिक शराब सेवन, एनिमिया, पिलीया, चक्कर आना, व मांस पेशियों के हठीले दर्द आदि के निदान के लिए पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। धनु और मीन राशि वाले तथा व्यापारियों को पंचमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। पुखराज से यह कहीं अधिक गुणकारी और सस्ता हैं।
 छः मुखी रूद्राक्ष : - यह रूद्राक्ष शिव पुत्र गणेश और कार्तिकेय स्वरूप है। इसके धारण से महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं। इसमें गणेश और कार्तिकेय स्वरूप होने के कारण इसके धारणकर्ता के लिए गौरी विशेष रूप से वरदायिनी और माता की भाँती सदैव सुलभ होती है। इस रूद्राक्ष का नियत्रंक और संचालक ग्रह शुक्र हैं जो भोग विलास और सुख सुविधा का प्रतिनिधि हैं।
      इसके प्रयोग द्वारा प्रेम, कामसुख, संगीत, कविता, सृजनात्मक और कलात्मक कुशलता, समझदारी, ज्ञान और वाक्य चातुर्य में लाभ होता हैं । यह ग्रह गुप्तेन्द्रिय, पूरूषार्थ, काम वासना , उत्तम भोग्य वस्तु , प्रेम संगीत आदि का कारक हैं। इस ग्रह के दुष्प्रभाव से नेत्र, यौन, मुख, मूत्र, ग्रीवा रोग और जलशोध आदि रोग होते हैं । कोढ़, नपुंसकता और मंद कामेच्छा, पथरी और किडनी सम्बन्धि रोग, मुत्र रोग, शुक्राणु की कमी व गर्भावस्था के रोग आदि में छः मुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए। वृष और तुला राशि वाले के लिए विशेष लाभकारी है।
 सातमुखी रूद्राक्ष : - सातमुखी रूद्राक्ष के देवता सात माताएँ और हनुमानजी हैं। पद्मपुराण के अनुसार सातमुखी रूद्राक्ष के सातो मुख में सात महाबलशाली नाग निवास करते हैं। सात मुखी रूद्राक्ष सप्त ऋषियों का स्वरूप हैं। यह रूद्राक्ष सम्पत्ति , कीर्ति और विजय श्री प्रदान करने वाला होता हैं। सात मुखी रूद्राक्ष साक्षात् अनंग स्वरूप है। अनंग को कामदेव के नाम से भी जाना जाता है। इस रूद्राक्ष के धारण से शरीर पर किसी भी प्रकार के विष का असर नहीं होता हैं। जन्म कुण्डली में यदि पूर्ण या आंशिक कालसर्प योग विद्यमान हो तो सातमुखी रूद्राक्ष धारण करने से पूर्ण अनुकूलता प्राप्त होती हैं। इसे धारण करने से विपुल वैभव और उत्तम आरोग्य की प्राप्ति होती हैं।इसे धारण करने से मनुष्य स्त्रियों के आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। इसके प्रयोग से तंदुरूस्ती, सौभाग्य और सम्पत्ति, रूके हुए कार्य, निराशापन को दूर किया जाता हैं।
       वशीकरण, आत्मविश्वास में वृद्धि, कामसुख व स्थिर विकास के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए । इस रूद्राक्ष का संचालक तथा नियंत्रक ग्रह शनि हैं यह रोग तथा मृत्यु का कारक हैं। यह ग्रह ठंडक, श्रम, नपुसंकता, पैरो के बीच तथा नीचे वाले भाग, गतिरोध, वायु, विष और अभाव का नियामक हैं। यह लोहा पेट्रोल, चमड़ा आदि का प्रतिनिधित्व करने वाला ग्रह हैं। शनि के प्रभाव से दुर्बलता, उदर पीड़ा, पक्षाघात, मानसिक चितां, अस्थि रोग, क्षय, केंसर, मानसिक रोग, जोड़ो का दर्द, अस्थमा, बहरापन, थकान, आदि रोग हो सकते है। शनि ग्रह भाग्य का कारक भी हैं। कुपित होने पर यह हताशा , कार्य विलम्बन आदि उत्पन्न करता हैं। जन्म कुण्डली में यदि नवें घर तथा नवें घर के स्वामी से किसी भी तरह संबद्ध हो जाता हैं तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय कठिनाई से व देरी से होता हैं। शनि और शनि की ढैया और साड़ेसाती से पीड़ित लोगों को शनि ग्रह को शान्त करने के लिए सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना लाभदायी हैं। 
आठमुखी रूद्राक्ष : - आठमुखी रूद्राक्ष में कार्तिकेय , गणेश ,अष्टमातृगण ,अष्टवसुकगण और गंगा का अधिवास माना गया है। इसके प्रयोग से शुत्रओं, विपत्तियों पर विजय प्राप्त होती हैं । दीर्घायु, ज्ञान, रिद्धी-सिद्धी के लिए व मन की एकाग्रता बढ़ाने हेतु भी यह रूद्राक्ष धारण किया जाता हैं । यह रूद्राक्ष मिथ्या भाषण से उत्पन्न पापों को नष्ट करता है। यह सम्पूर्ण विध्नों को नष्ट करता हैं। आठमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह राहू है। जो छाया ग्रह हैं। इसमें शनि ग्रह की भांति शनि ग्रह से भी बढ़कर प्रकाशहीनता का दोष हैं। यह शनि की तरह लम्बा ,पीड़ादायक ,अभाव ,योजनाओं में विलम्ब करने वाला एवं रोगकारक है। राहू ग्रह घटनाओं को अकस्मात भी घटित कर देता हैं। चर्मरोग , फेफड़े की बीमारी , पैरों का कष्ट, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले व मोतियाबिन्द आदि रोगों का कारक राहू ग्रह हैं। आठमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उक्त सभी रोगों एवं राहू की पीड़ाओं से मुक्ति मिलती हैं। 
 नौमुखी रूद्राक्ष : - नौमुखी रूद्राक्ष भैरव स्वरूप हैं। इसमें नौ शक्तियों का निवास हैं इसके धारण करने से सभी नौ शक्तियां प्रसन्न होती हैं। इसके धारण करने से यमराज का भय नहीं रहता हैं। इसके उपयोग से सफलता, सम्मान, सम्पत्ति, सुरक्षा, चतुराई, निर्भयता, शक्ति, कार्यनिपुणता, वास्तुदोष में लाभ लिया जा सकता हैं । नौमुखी रूद्राक्ष का नियंत्रक और संचालक ग्रह केतु हैं जो राहु की तरह ही छाया ग्रह हैं। जिस प्रकार राहु शनि के सदृश हैं , उसी प्रकार केतु मंगल के सदृश हैं। मंगल की तरह केतू भी अपने सहचर्य और दृष्टि के प्रभाव में आने वाले पदार्थो को हानि पहुँचाता हैं। केतू के कुपित होने पर फेफड़े का कष्ट , ज्वर , नेत्र पीड़ा, बहरापन, अनिद्रा, संतानप्राप्ति, उदर कष्ट, शरीर में दर्द दुर्घटना एवं अज्ञात कारणों से उत्पन्न रोग परेशान करते हैं। केतू को मोक्ष का कारक भी माना गया हैं। केतू ग्रह की शांति के लिए लहसुनिया रत्न का प्रयोग किया जाता हैं किन्तू नौमुखी रूद्राक्ष लहसुनियां रत्न से कई गुना ज्यादा प्रभावी हैं।
दसमुखी रूद्राक्ष : - दशमुखी रूद्राक्ष पर यमदेव , भगवान विष्णु , महासेन दस दिक्पाल और दशमहाविद्याआओं का निवास होता हैं। इसका इष्टदेव विष्णु हैं। यह सभी ग्रहों को शांत करता हैं । इसके उपयोग से पारिवारिक शांति, सभी प्रकार की सफलता, दिव्यता एवं एकता प्राप्त होती हैं । इसके धारण से सभी प्रतिकूल ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। इसके धारण से सभी नवग्रह शांत और प्रसन्न होते हैं। इस रूद्राक्ष का प्रभाव ग्रहातंरों तक जाता हैं और ग्रहातंरों से आता हैं। यह समस्त सुखों को देने वाला शक्तिशाली और चमत्कारी रूद्राक्ष हैं। इसके उपयेग से कफ, फैफड़े सम्बन्धि रोग, चिंता, अशक्ति, हृदय रोग आदि में लाभ होता हैं। 
 ग्यारहमुखी रूद्राक्ष : - ग्यारहमुखी रूद्राक्ष एकादश रूद्र स्वरूप हैं। यह अत्यन्त ही सौभाग्यदायक रूद्राक्ष हैं। एक सौ सहस्त्र गायों के सम्यक दान से जो फल प्राप्त होता हैं वह फल ग्यारहमुखी रूद्राक्ष के धारण करने से तत्काल प्राप्त होता है। इस रूद्राक्ष पर इन्द्र का स्वामित्व हैं इन्द्र की प्रसन्नता से ऐश्वर्य और यश की प्राप्ति होती हैं। इसके धारण करने से समस्त इन्द्रिया और मन नियंत्रित होता हैं। इसके प्रयोग से कुण्डली जागरण, योग सम्बंधी एकाग्रता, वैद्यकिय कार्य, निर्भयता, निर्णय क्षमता एवं सभी प्रकार से अकस्मात सुरक्षा में लाभ होता हैं । यह रूद्राक्ष योग साधना में प्रवृत व्यक्तियों के लिए बहुत अनुकूल हैं। यह शरीर , स्वास्थ्य , यम नियम , आसन , षटकर्म या अन्य यौगिक क्रियाओं में आने वाली बाधाओं को नष्ट करता हैं। स्वास्थ्य को सुद्रण बनाने वाले साधकों के लिए यह भगवान शिव का अनमोल उपहार हैं। इसके प्रयोग से स्त्रीरोग, स्नायुरोग, पुराने हठीले रोगों से छुटकारा, शुक्राणु की कमी व संतानप्राप्ति में लाभ होता हैं ।  
बारहमुखी रूद्राक्ष : - बारहमुखी रूद्राक्ष आदित्य अर्थात सूर्य स्वरूप हैं। सभी शास्त्र और पुराणों में इस रूद्राक्ष पर सूर्य की प्रतिष्ठा मानी गई हैं। इस रूद्राक्ष को धारण करने वाला निरोगी और अर्थलाभ करके सुख भोगता हुआ जीवन व्यतीत करता हैं दरिद्रता कभी उसे छू भी नहीं पाती। यह रूद्राक्ष सभी प्रकार की दुर्घटनाओं से बचाकर शक्ति प्रदान करता हैं। जो मनुष्य सर्वाधिकार सम्पन्न बनकर सम्राट की तरह शासन करना चाहता हो उसे यह रूद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। क्योंकि सूर्य स्वयं बारहमुखी रूद्राक्ष पर प्रतिष्ठित होकर धारणकर्ता को सूर्यवत् तेजस्विता , प्रखरता और सम्राट स्वरूपता प्रदान करता हैं। 
      नेतृत्व के गुण, बड़े सम्मान, ताकत, आत्मसम्मान, आत्म विश्वास, प्रेरणा, श्रद्धा, स्वास्थ्य, एवं ताकत आदि इसके प्रयोग से प्राप्त होते हैं। विश्व के अंधकार को दूर करने वाला सूर्य इस रूद्राक्ष के माध्यम से धारणकर्ता के मन के भीतर के दुःख , निराशा , कुंठा , पीड़ा और दुर्भाग्य के अंधकार को दूर कर देता है। सूर्य तेजोपुंज हैं , अतः बारहमुखी रूद्राक्ष रूद्राक्ष भी धारणकर्ता को तेजस्वी और यशस्वी बना देता हैं। गुणों में यह माणिक्य से अधिक प्रभावी तथा मूल्य में अधिक सस्ता हैं। इसके प्रयोग द्वारा सरदर्द , गंजापन, बुखार, ऑखों के रोग, हृदय रोग, दर्द और बुखार, मुत्राशय एवं पित्ताशय की जलन जैसे रोगों में लाभ होता हैं। 
 तेरहमुखी रूद्राक्ष - तेरहमुखी रूद्राक्ष साक्षात् कामदेव स्वरूप हैं। यह सभी कामनाओं और सिद्धियों को देने वाला हैं। इसे धारण करने से कामदेव प्रसन्न होते है। इसे धारण करने से वशीकरण और आकर्षण होता हैं । जीवन के सभी ऐशो-आराम, सुन्दरता, रिद्धी-सिद्धी और प्रसिद्धी, वशीकरण एवं लक्ष्मी प्राप्ति हेतु इसका उपयोग लाभकारी होता हैं। जो व्यक्ति सुधा-रसायन का प्रयोग करना चाहते हैं, जो धातुओं के निर्माण के लिए कृतसंकल्प हैं जिसका स्वभाव रसिक हैं उन्हे इस रूद्राक्ष के धारण से सिद्धि प्राप्त होती हैं, सभी कामनाओं की पूर्ति अर्थ-लाभ, रस-रसायन की सिद्धियॉ और सम्पूर्ण सुख-भोग मिलता हैं । 
     इस रूद्राक्ष पर कामदेव के साथ उनकी पत्नी रति का भी निवास हैं इसीकारण ये रूद्राक्ष दाम्पत्य जीवन की सभी खुशियां प्रदान कराने में सक्षम हैं। हिमालय में स्थित तपस्वी और योगीगण तेरहमुखी रूद्राक्ष की अध्यात्मिक उपलब्धियों से वशीभूत होकर इस रूद्राक्ष को धारण करते हैं। इसके उपयोग से किडनी, नपुंसकता, मुत्राशय के रोग, कोढ़, गर्भावस्था के रोग, शुक्राणु की कमी आदि में आश्चर्यजनक लाभ होता हैं ।
 चौदहमुखी रूद्राक्ष - चौदहमुखी रूद्राक्ष श्री कंठ स्वरूप हैं । यह रूद्रदेव की ऑखों से विशेष रूप से उत्पन्न हुआ हैं। जो व्यक्ति इस परमदिव्य रूद्राक्ष को धारण करता है, वह सदैव ही देवताओं का प्रिय रहता हैं । यह रूद्राक्ष त्रिकाल सुखदायक हैं । यह समस्त रोगों का हरण करने वाला सदैव आरोग्य प्रदान करने वाला हैं । इसके धारण करने से वंशवृद्धि अवश्य होती हैं । इसके उपयोग द्वारा जातक की सभी तरह के बुरे तत्वों से रक्षा होती हैं । यह जातक को गरीबी से दूर रखता हैं । छटी इन्द्रीय व अर्न्तज्ञान तथा अतिंद्रिय शक्ति का मालिक बनाता हैं। चौदहमुखी रूद्राक्ष में हनुमान जी का भी अधिवास माना गया हैं यह रूद्राक्ष भूत, पिशाच, डाकिनी, शकिनी से भी रक्षा करता हैं । इससे बल और उत्साह का वर्धन होता हें । 
     इससे निभ्रयता प्राप्त होती हैं और संकटकाल में सरंक्षण प्राप्त होता हैं । विपत्ति और दुर्घटना से बचने के लिए हनुमान जी (रूद्र) के प्रतीक माने जाने वाले चौदहमुखी रूद्राक्ष को अवश्य प्रयोग करना चाहिए । यह रूद्राक्ष चमत्कारी हैं । इससे अनंतगुण विद्यमान हैं । शास्त्र प्रमाण के अनुसार मानव-वाणी से इनके गुणों का व्याख्यान संभव नहीं हैं इसका धारणकर्ता स्वर्ग को प्राप्त करता हैं । वह चौदहों भुवनों का रक्षक और स्वामी बन जाता हैं। जिसने चौदहमुखी रूद्राक्ष धारणकर लिया शनि जैसा क्रोधी ग्रह भी लाख चाहकर उसका बुरा नहीं कर सकता । यह शास्त्रोक्त सत्य हैं । साधन सम्पन्न लोगों को आवश्यक रूप से इस दिव्य रूद्राक्ष का उपयोग अवश्य करना चाहिए। इसके प्रयोग द्वारा निराशापन, मानसिक रोग, अस्थमा, पक्षाघात, वायु के रोग, बहरापन, केंसर, चित्तभ्रम, थकान और पैरों के रोगों में लाभ होता हैं। 
 गौरी शंकर रूद्राक्ष :- मुख वाले रूद्राक्षों में गौरीशंकर रूद्राक्ष सर्वोपरि हैं, जिस प्रकार लक्ष्मी का पूजन उनके पति नारायण (विष्णुजी) के साथ करने लक्ष्मी-नारायण की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं ठीक इसी प्रकार गौरी (माँ पार्वती) के साथ देवाधिदेव भगवान शिव का पूजन करने से गौरी-शंकर की अभीष्ट कृपा प्राप्त होती हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष धारण पूजन से तो गौरीशंकर की कृपा निश्चित रूप से प्रापत होती ही हैं इससे किंचित मात्र भी संदेह नहीं हैं ।
      इसके उपयोग से पारिवारिक एकता, आत्मिक ज्ञान, मन और इंद्रियों पर काबू, कुण्डलिनी जागरण एवं पति-पत्नि की एकता में वृद्धि होती हैं। बड़े से बड़ा विघ्न इस रूद्राक्ष के धारण करने से समूल नष्ट होता हैं जन्म के पाप इस रूद्राक्ष के धारण मात्र से काफूर हो जाते हैं गौरीशंकर रूद्राक्ष में गौरी स्वरूप भगवती पार्वती का निवास होने के कारण इस रूद्राक्ष पर भगवान शिव की विशेष कृपा हैं मानसिक शारीरिक रोगों से पीड़ित मनुष्यों/स्त्रियों के लिए ये रूद्राक्ष दिव्यौषधि की भांति काम करता हैं । जन्म पत्री में यदि दुखदायी ‘‘कालसर्प योग‘‘ पूर्णरूप से अथवा आंसिक रूप से प्रकट होकर जीवन को कष्टमय बना रहा हो तो व्यक्ति को अविलम्ब 8 मुखी + 9 मुखी + गौरीशंकर रूद्राक्ष अर्थात तीनों ही रूद्राक्षों का संयुक्त बन्ध बनवाकर धारण करना चाहिये क्योकिं कालसर्प दोष केवल शिव कृपा से ही दूर होता हैं और गौरीशंकर रूद्राक्ष के साथ राहू एवं केतु के 8 एवं 9 मुखी रूद्राक्ष बन्ध निश्चित रूप से कालसर्प योग से पूर्णतः मुक्ति दिलाने में सर्वश्रेष्ट हैं । 
 गणेश रूद्राक्ष :- सन्तान प्राप्ति में बाधा एवं वैवाहिक अडचनें और विलम्ब होने पर ‘‘गणेश रूद्राक्ष‘‘ का धारण चमत्कार दिखाता हैं । विघ्न विनाशक गणेश माँ पार्वती एवं देवाधि देव भगवान शंकर की पूर्ण कृपा प्रदायक ये रूद्राक्ष दिव्य हैं परम दुर्लभ हैं। इसके प्रयोग से विद्या व ज्ञान प्राप्ति, मानसिक असंतोष एवं सभी तरह के अवरोध दूर होते हैं । विशेष रूप से संतान बाधा एवं पुत्र-पुत्री के विवाह में आ रही बाधा को निश्चित दूर करके अविलम्ब कार्य सिद्धि प्रदान करता हैं । त्वचा रोग, हिचकी, गुप्तरोग, मानसिक अशांति, सर्पदंश, केंसर एवं तांत्रिक विद्या से होने वाले दुष्परिणामों में उत्तम लाभ देता हैं। 
 पथरी रूद्राक्ष :- यह रूद्राक्ष उत्कृष्ट गुणवन्त रूद्राक्ष हैं । आमतौर पर पाए जाने वाले रूद्राक्ष से इसकी गुणवत्ता काफी उच्च होती हैं । इसमें विटामिन और इलेक्ट्रोमेग्नेटिक तरंगो की मात्रा अधिक होती हैं । पथरी रूद्राक्ष कुदरती तौर पर मजबूत होने के कारण इसकी आयु कई सौ साल की होती हैं। उच्च परिणाम के लिए पथरी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए ।


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