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आइये जाने और समझें दुर्घटनाओं का योग को--- (क्यों होते हैं एक्सीडेंट/दुर्घटना)

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अक्सर हम सभी स्वयं अपने जीवन में और अपने आस-पास के लोगों के जीवन में बहुत बार एक्सीडैंट या दुर्घटनाओं को होते देखते हैं जो सामान्य रूप से चल रहे जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर देते हैं वाहन से होने वाले एक्सीडैंट तो अक्सर हमारे सामने आते ही रहते हैं, कई बार समान्य रूप से रास्ते में चल रहे लोग दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं तो कई बार घर बैठे ही दुर्घटनाएं हो जाती हैं तो कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके साथ अक्सर चोट आदि लगने की घटनाएं होती ही रहती हैं इन दुर्घटनाओं को लेकर जब हमने उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से ग्रहों के संबंध में बात की तो उन्होंने बताया कि मंगल, शनि और राहू के समीकरण से फिलहाल दुर्घटनाओं और मौत के मामले बढ़े हैं। 
        आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से इस विषय में विस्तार से— आइये जाने और समझें को--- 
आइये जाने और समझें दुर्घटनाओं का योग को--- (क्यों होते हैं एक्सीडेंट/दुर्घटना)-Let-understand-the-sum-of-accidents       ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि दुर्घटनाओं का गणित समझने के लिए हमें अपने देश की कुंडली पर नजर डालनी होगी। देश की गोचर कुंडली में 26 अक्टूबर से शनि लग्न कुंडली की धनु राशि पर यानी अष्टम भाव में आ गया है। अष्टम भाव मृत्यु का भाव होता है। मंगल कन्या राशि पर है यानी लग्न कुंडली के पंचम भाव में है। राहू कर्क पर है यानी लग्न कुंडली के तीसरे भाव पर है। इस स्थिति में मंगल और राहू दोनों ही शनि को देख रहे हैं और शनि इन्हें देख रहा है। वहीं सूर्य गोचर कुंडली में तुला राशि पर हैं, यानी लग्न राशि के छठवें भाव में हैं। तुला में होने के कारण सूर्य नीच का है। इस तरह शनि, राहू और मंगल का समीकरण व सूर्य का नीच राशि में होने से दुर्घटनाएं व मृत्यु के मामले तेजी से बढ़े हैं। 
       सभी नौ ग्रहों में एक शनि ऎसा ग्रह है जो सबसे अधिक समय तक एक राशि में रहता है. इसी तरह गोचर में कभी न कभी ग्रहों का संबंध एक साथ बनता है,जैसे अभी मंगल और शनि का युति संबंध बन रहा है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि और मंगल दोनों ही क्रूर एवं पाप ग्रह माने जाते हैं.जहां एक और मंगल बहुत उग्र, क्रोधी हैं और इनकी प्रकृति तमस गुणों वाली मानी गई है. इसी प्रकार अपनी धीमि गति से चलते हुए शनिदेव अपना असरदार प्रभाव देते हैं, अपने अद्वितीय तेज से दोनों ही ग्रह सभी को प्रभावित करते से दिखाई देते हैं. यह सभी पर ऊर्जावान कार्रवाई, आत्मविश्वास तथा अहंकार का प्रतिनिधित्व करते हैं. शनि और मंगल आपस में एक-दूसरे के शत्रु हैं. मृत्यु के कारक शनि और रक्त के कारक ग्रह मंगल एक दूसरे का के साथ युति में होना बहुत सी परेशानियों का कारण बन सकता है. 
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शनि तोड़ेगा हड्डी और मंगल निकालेगा खून---
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि लोहे के स्वामी माना जाता है। इस कारण वाहन का प्रयोग करने वालों को सावधानी बरतनी होगी। शनि की इस स्थिति से हड्डी टूटने या इस तरह की अन्य समस्याएं सामने आएंगी, वहीं मंगल खून निकालता है। इसके अलावा सूर्य का नीच राशि में होना और राहू का कर्क में होना इन दुर्घटनाओं को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। कुंडली में शनि और मंगल की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है. जन्म कुंडली में इन दोनों ग्रहों की युति यानी एक ही भाव में साथ होना अच्छा संकेत नही माना जाता है .गोचर में भी शनि और मंगल की अशुभ युतियां देखी जा सकती हैं जिनका असर कुछ खास अच्छा नहीं होता है. इन ग्रहों का शत्रु के साथ होना अच्छा नहीं माना जाता है. यह दुघर्टना और संकट का सूचक बनते हैं | 
        शनि मंगल का दृष्टि संबंध बनना और षडाष्टक योग बनाना आपदाओं का कारण हो सकता है. हाल फिलहाल बनने वाला मंगल का शनि के साथ कन्या राशि में यह योग इस समय अनेक परेशानियों, दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है. प्राकृतिक आपदाएं और राष्ट्रों का आपसी मतभेद बढ़ सकता है. आतंकी घटनाओं में तेजी की संभावना देखी जा सकती है | मंगल का राशि परिवर्तन का असर सभी पर दिखाई दे सकता है. मंगल राशि परिवर्तन और शनि के साथ युति से अचानक सफलता और वाणी एवं चतुराई में तेजी देखी जा सकती है. अनावश्यक गुस्सा और मानसिक तनाव बढ़ सकता है. नए उत्तरदायित्व मिल सकते हैं और व्यवसायियों को धन लाभ होने के योग बनते हैं. रूके हुए कार्य मेहनत से करने पर ही पूरे होंगे. वाहन, मशिनरी के क्रय- विक्रय से लाभ हो सकता है इस समय में दुर्घटना और धन हानि के योग भी बन सकते हैं. भूमि प्रॉपर्टी से संबंधित लोगों के लिए ये समय अच्छा रह सकता है. व्यर्थ के विवाद का सामना भी करना पड़ सकता है| 
       वर्तमान में ग्रहों की स्थिति पर नजर डाले तो इस आधार पर मंगल का शनि से योग बना रहा है. ग्रहों की यह स्थिति राष्ट्र के मौजूदा घटना क्रम व वर्तमान उथल-पुथल का कारण बन सकती हैं. सांसारिक जीवन में आजीविका, नौकरी, कारोबार, सेहत या संबंधों के लिए मिले जुले परिणाम देने वाला हो सकता है |दशम व्यापार-व्यवसाय भाव का स्वामी शनि से दृष्ट होकर कुंभ राशि में सप्तमस्थ होने से स्त्री वर्ग पर अत्याचार नहीं रुकेंगे, वहीं बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं आएगी।घटना-दुर्घटनाओं में कमी के योग कम ही हैं। शत्रु पक्ष पर प्रभाव में वृद्धि होगी। यह समय शासन-प्रशासन के लिए कड़ी परीक्षा का रहेगा। राजनेताओं को सावधानीपूर्वक चलना होगा। कहीं भूकंप या रेल दुर्घटनाओं के योग बनेंगे। शनि लोहे का कारक होता है व वक्र गति से चलने से उक्त समय सावधानी का रहेगा। शनि का राशि परिवर्तन देश के लिए खतरे का भी संकेत है।
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कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके साथ अक्सर चोट आदि लगने की घटनाएं होती ही रहती हैं ज्योतिष के दृष्टिकोण से कुछ विशेष ग्रह योग ही एक्सीडैंट की घटनाओं का कारण बनते हैं तो आज हम एक्सीडैंट या दुर्घटना के पीछे की ग्रहस्थितियों के बारे में चर्चा करेंगे – ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि “ज्योतिष में “मंगल” को दुर्घटना, एक्सीडेंट या चोट लगना, हड्डी टूटना, जैसी घटनाओं का कारक ग्रह माना गया है “राहु” आकस्मिक घटनाओं को नियंत्रित करता है इसके आलावा “शनि” वाहन को प्रदर्शित करता है तथा गम्भीर स्थितियों का प्रतिनिधित्व करता है अब यहाँ विशेष बात यह है के अकेला राहु या शनि दुर्घटना की उत्पत्ति नहीं करते जब इनका किसी प्रकार मंगल के साथ योग होता है तो उस समय में दुर्घटनाओं की स्थिति बनती है। 
      शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग एक विध्वंसकारी योग होता है जो बड़ी दुर्घटनाओं को उत्पन्न करता है। जिस समय गोचर में शनि और मंगल एक ही राशि में हो, आपस में राशि परिवर्तन कर रहे हों या षडाष्टक योग बना रहे हों तो ऐसे समय में एक्सीडैंट और सड़क हादसों की संख्या बहुत बढ़ जाती है ऐसा ही राहु मंगल के योग से भी होता है। जिन व्यक्तियों की कुंडली में शनि,मंगल और राहु,मंगल का योग होता है उन्हें जीवन में बहुत बार दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है अतः ऐसे व्यक्तियों को वाहन आदि का उपयोग बहुत सजगता से करना चाहिए। किसी व्यक्ति के साथ दुर्घटना होने में उस समय के गौचर ग्रहों और ग्रह दशाओं की बड़ी भूमिका होती है जिसकी चर्चा हम आगे कर रहें हैं” 
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 जानिए क्या आपकी पत्रिका में हैं दुर्घटना योग ??? 
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जन्म पत्रिका से भी जाना जा सकता है दुर्घटनाओं के बारे में। यदि हमें पूर्व से जानकारी हो जाए तो हम संभलकर उससे बच सकते हैं। दुर्घटना तो होना है लेकिन क्षति न पहुँच कर चोट लग सकती है। जिस प्रकार हम चिलचिलाती धूप में निकलें और हमने छाता लगा रखा हो तो धूप से राहत मिलेगी, उसी प्रकार दुर्घटना के कारणों को जानकर उपाय कर लिए जाएँ तो उससे कम क्षति होगी। इसके लिए 6ठा और 8वाँ भाव महत्वपूर्ण माना गया है। इनमें बनने वाले अशुभ योग को ही महत्वपूर्ण माना जाएगा। किसी किसी की पत्रिका में षष्ठ भाव व अष्टमेश का स्वामी भी अशुभ ग्रहों के साथ हो तो ऐसे योग बनते हैं। वाहन से दुर्घटना के योग के लिए शुक्र जिम्मेदार होगा। लोहा या मशीनरी से दुर्घटना के योग का जिम्मेदार शनि होगा। आग या विस्फोटक सामग्री से दुर्घटना के योग के लिए मंगल जिम्मेदार होगा। 
     चौपायों से दुर्घटनाग्रस्त होने पर शनि प्रभावी होगा। वहीं अकस्मात दुर्घटना के लिए राहु जिम्मेदार होगा। अब दुर्घटना कहाँ होगी? इसके लिए ग्रहों के तत्व व उनका संबंध देखना होगा। 
  1. · षष्ठ भाव में शनि शत्रु राशि या नीच का होकर केतु के साथ हो तो पशु द्वारा चोट लगती है।
  2.  · षष्ठ भाव में मंगल हो व शनि की दृष्टि पड़े तो मशीनरी से चोट लग सकती है। 
  3. · अष्टम भाव में मंगल शनि के साथ हो या शत्रु राशि का होकर सूर्य के साथ हो तो आग से खतरा हो सकता है।
  4.  · चंद्रमा नीच का हो व मंगल भी साथ हो तो जल से सावधानी बरतना चाहिए।
  5.  · केतु नीच का हो या शत्रु राशि का होकर गुरु मंगल के साथ हो तो हार्ट से संबंधित ऑपरेशन हो सकता है।
  6.  · ‍शनि-मंगल-केतु अष्टम भाव में हों तो वाहनादि से दुर्घटना के कारण चोट लगती है। 
  7. · वायु तत्व की राशि में चंद्र राहु हो व मंगल देखता हो तो हवा में जलने से मृत्यु भय रहता है। 
  8. · अष्टमेश के साथ द्वादश भाव में राहु होकर लग्नेश के साथ हो तो हवाई दुर्घटना की आशंका रहती है। 
  9. · द्वादशेश चंद्र लग्न के साथ हो व द्वादश में कर्क का राहु हो तो अकस्मात मृत्यु योग देता है। 
  10. · मंगल-शनि-केतु सप्तम भाव में हों तो उस जातक का जीवनसाथी ऑपरेशन के कारण या आत्महत्या के कारण या किसी घातक हथियार से मृत्यु हो सकती है।
  11.  · अष्टम में मंगल-शनि वायु तत्व में हों तो जलने से मृत्यु संभव है। 
  12. · सप्तमेश के साथ मंगल-शनि हों तो दुर्घटना के योग बनते हैं। इस प्रकार हम अपनी पत्रिका देखकर दुर्घटना के योग को जान सकते हैं। यह घटना द्वितीयेश मारकेश की महादशा में सप्तमेश की अंतरदशा में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में घट सकती है। उसी प्रकार सप्तमेश की दशा में द्वितीयेश के अंतर में अष्टमेश या षष्ठेश के प्रत्यंतर में हो सकती है। जिस ग्रह की मारक दशा में प्रत्यंतर हो उससे संबंधित वस्तुओं को अपने ऊपर से नौ बार विधिपूर्वक उतारकर जमीन में गाड़ दें यानी पानी में बहा दें तो दुर्घटना योग टल सकता है। 

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कुंडली बताती हे दुर्घटना योग (एक्सीडेंट के कारण) —
  1.  पहनने-ओढ़ने के साथ तेज रफ्तार से वाहन चलाना यह सभी प्रमुख शौक होते हैं। नए से नया वाहन लेना यह हरेक का सपना होता है मगर क्या चाहने भर से या केवल सपना देखने से वाहन सुख मिलता है। नहीं! वाहन सुख के लिए भी ग्रह योगों का प्रबल होना जरूरी है।
  2.  यदि चतुर्थ भाव प्रबल हो, शुक्र की राशि हो या शुक्र की दृष्टि में हो तो नया व मनचाहा वाहन प्राप्त होता है।
  3.  यदि चतुर्थ भाव में शनि की राशि हो और शनि यदि नीचस्थ या पाप प्रभाव में हो तो सेकंडहैंड वाहन मिलता है। 
  4. यदि चतुर्थ का स्वामी लग्न, दशम या चतुर्थ में हो तो माता-पिता के सहयोग से, उनके नाम का वाहन चलाने को मिलता है। च
  5. तुर्थेश यदि कमजोर हो तो वाहन सुख या तो नहीं मिलता या फिर दूसरे का वाहन चलाने को मिलता है। 
  6. चतुर्थेश युवावस्था में हो (डिग्री के अनुसार) तो वाहन सुख जल्दी मिलता है, वृद्ध हो तो देर से वाहन सुख मिलता है।  

  • वाहन की खराबी : चतुर्थेश यदि पाप ग्रह हो, कमजोर हो, पाप प्रभाव में हो तो वाहन प्राप्त होने पर भी बार-बार खराब हो जाता हैं। मंगल खराब हो तो (चतुर्थेश होकर) इंजन में गड़बड़ी, शनि के कारण कल-पुर्जों में खराबी, राहु की खराबी से टायर पंचर होना व अन्य ग्रहों की कमजोरी से वाहन की कार्यप्रणाली में गड़बड़ी आना दृष्टिगत होता है। 
  •  दुर्घटना योग : वाहन है तो दुर्घटना, चोट-खरोंच का भय बना ही रहता है। यदि सेंटर हाउस का स्वामी, लग्न, अष्टम भाव मजबूत है मगर तीसरा भाव या उसका स्वामी कमजोर हो तो वाहन के साथ छोटी-मोटी टूट-फूट हो सकती है, व्यक्ति को भी छोटी-मोटी चोट लग सकती है। यदि लग्न व सेंटर हाउस का स्वामी दोनों पाप प्रभाव में हो, तीसरा भाव खराब हो मगर अष्टम भाव मजबूत हो तो दुर्घटना तो होती है, मगर जान को खतरा नहीं रहता। यदि अष्टम भाव व तीसरा भाव कमजोर हो तो भयंकर दुर्घटना के योग बन हैं जिससे जान पर भी बन सकती है। शनि के कारण दुर्घटना में पैरों पर चोट लग सकती है, जब कि मंगल सिर पर चोट करता है। 
  •  उपाय : यदि कुंडली में एक्सीडेंट योग दिखें तो उस ग्रह को मजबूत करें, वाहन जीवन भर सावधानी से चलाएँ और वाहन के रख-रखाव का विशेष ध्यान रखें। इंश्योरेंस अवश्य कराएँ। 
  •  विशेष : वाहन सुख प्राय: चतुर्थेश की दशा-महादशा-अंतरदशा में प्राप्त होता है। उसी तरह दुर्घटना योग भी तृतीयेश-अष्टमेश की दशा-महादशा में बनते है अत: पूर्वानुमान कर सावधानी बरती जा सकती है। 

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जानिए कैसे लगाएं जन्म कुंडली से दुर्घटना का पूर्व अनुमान -- 
 जब किसी जातक की कम कुंडली में लग्न, चन्द्रमा और सूर्य :12 वा , 8 वा , ४ भाव दुर्घटना का संबंध लग्न और लग्नेश से रहता है। लग्न जातक के स्वयं का होता है। लग्न में शुभ ग्रह होना चाहिये हैं। अशुभ ग्रह हानि पहुंचाते हैं। शुभ ग्रह स्थित होने से ,और दृष्टि होने से सुरक्षा होती है। अकारक ग्रह या मारक ग्रह जब भी लग्न या लग्नेश पर गोचर करता है तब दुर्घटना होने के योग बनते है। अकारक ग्रह या मारक ग्रह की यदि दशा-अंतर्दशा चल रही हो, तो जातक को कष्ट और दुर्घटना होने के योग बनते है। मंगल ग्रह जातक को दुर्घटना में अधिक चोट आती या रक्त भी बहता है।
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 ऐसे जानिए दुर्घटना का समय :
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ग्रह का गोचर लग्न पर हो ,वही समय दुर्घटना का होता है। इसी तरह से आने वाली दुर्घटना का पूर्व अनुमान लगाया जा सकता है। ग्रह मंगल और शनि दुर्घटनाओं के योग बनाते हैं दुर्घटनाओं के लिए कुछ और योग :--- लग्न या दूसरे घर में राहु और मंगल, लग्न में शनि, लग्न में मंगल ग्रह, तीसरे घर में मंगल या शनि ग्रह ,5 वीं भाव में, मंगल या शनि .दशा अवधि:12 वा , 8 वा , 4 भाव की ग्रह की महादशा ,अंतर्दशा, प्रत्यंतर्दशा,अवधि के दौरान दुर्घटना हो सकती है या अस्पताल में भर्ती हो सकते है। 
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कुछ विशेष योग – 
 यदि कुंडली में शनि मंगल का योग हो और शुभ प्रभाव से वंछित हो तो जीवन में चोट लगने और दुर्घटनाओं की स्थिति बार बार बनती है। शनि मंगल का योग यदि अष्टम भाव में बने तो अधिक हानिकारक होता है ऐसे व्यक्ति को वाहन बहुत सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। यदि कुंडली में शनि और मंगल का राशि परिवर्तन हो रहा हो तब भी चोट आदि लगने की समस्या समय समय पर आती है। कुंडली में राहु, मंगल की युति भी दुर्घटनाओं को बार बार जन्म देती है यह योग अष्टम भाव में बनने पर बहुत समस्या देता है। यदि मंगल कुंडली के आठवें भाव में हो तो भी एक्सीडेंट आदि की घटनाएं बहुत सामने आती हैं। मंगल का नीच राशि (कर्क) में होना तथा मंगल केतु का योग भी बार बार दुर्घटनाओं का सामना कराता है। 
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जानिए जन्म कुंडली से दुर्घटना काल – 
 एक्सीडैंट की घटनाएं कुछ विशेष ग्रहस्थिति और दशाओं में बनती हैं--- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि व्यक्ति की कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उस राशि में जब शनि गोचर करता है तो ऐसे में एक्सीडैंट की सम्भावना बनती हैं। कुंडली में शनि जिस राशि में हो उस राशि में मंगल गोचरवश जब आता है तब चोट आदि लगने की सम्भावना होती है। जब कुंडली में मंगल जिस राशि में हो उसमे राहु गोचर करे या राहु जिस राशि में कुंडली में स्थित हो उसमे मंगल गोचर करे तो भी एक्सीडैंट की स्थिति बनती है। जब जन्मकुंडली में दशावश राहु और मंगल का योग हो अर्थात राहु और मंगल की दशाएं एक साथ चल रही हों ( राहु में मंगल या मंगल में राहु ) तो भी एक्सीडेंट होने का योग बनता है ऐसे समय में वाहन चलाने में सतर्कता बरतनी चाहिए | =========================================================== 
जानिए आपकी जन्म कुंडली में दुर्घटना होने के योग--- 
 दुर्घटना का जिक्र आते ही जिन ग्रहों का सबसे पहले विचार करना चाहिए वे हैं शनि, राहु और मंगल यदि जन्मकुंडली में इनकी स्थिति अशुभ है (6, 8, 12 में) या ये नीच के हों या अशुभ नवांश में हों तो दुर्घटनाओं का सामना होना आम बात है। 
  1. शनि : ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि का प्रभाव प्राय: नसों व हड्डियों पर रहता है। शनि की खराब स्थिति में नसों में ऑक्सीजन की कमी व ‍हड्डियों में कैल्शियम की कमी होती जाती है अत: वाहन-मशीनरी से चोट लगना व चोट लगने पर हड्डियों में फ्रैक्चर होना आम बात है। यदि पैरों में बार-बार चोट लगे व हड्डी टूटे तो यह शनि की खराब स्थिति को दर्शाता है। 
  2.  राहु : राहु का प्रभाव दिमाग व आँखों पर रहता है। कमर से ऊपरी हिस्से पर ग्रह विशेष प्रभाव रखता है। राहु की प्रतिकूल स्थिति जीवन में आकस्मिकता लाती है। दुर्घटनाएँ, चोट-चपेट अचानक लगती है और इससे मनोविकार, अंधापन, लकवा आदि लगना राहु के लक्षण हैं। पानी, भूत-बाधा, टोना-टोटका आदि राहु के क्षेत्र में हैं। 
  3.  मंगल : ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि मंगल हमारे शरीर में रक्त का प्रतिनिधि है। मंगल की अशुभ स्थिति से बार-बार सिर में चोट है। खेलते-दौड़ते समय गिरना आम बात है और इस स्थिति में छोटी से छोटी चोट से भी रक्त स्राव होता जाता है। रक्त संबंधी बीमारियाँ, मासिक धर्म में अत्यधिक रक्त स्राव भी खराब मंगल के लक्षण हैं। अस्त्र-शस्त्रों से दुर्घटना होना, आक्रमण का शिकार होना इससे होता है।

 क्या करें :
 मंगलवार का व्रत करें, मसूर की दाल का दान करें। उग्रता पर नियंत्रण रखें। मित्रों की संख्या बढ़ाएँ। मद्यपान व माँसाहार से परहेज करें। अपनी ऊर्जा को रचनात्मक दिशा दें।
 कब-कब होगी परेशानी : 
जब-जब इन ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा या प्रत्यंतर दशा आएगी, तब-तब संबंधित दुर्घटनाओं के योग बनते हैं। इसके अलावा गोचर में इन ग्रहों के अशुभ स्थानों पर जाने पर, स्थान बदलते समय भी ऐसे कुयोग बनते हैं अत: इस समय का ध्यान रखकर संबंधित उपाय करना नितांत आवश्यक है। 
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जन्म कुंडली में आठवाँ भाव अथवा अष्टमेश, मंगल तथा राहु से पीड़ित होने पर दुर्घटना होने के योग बनते हैं. सारावली के अनुसार शनि, चंद्रमा और मंगल दूसरे, चतुर्थ व दसवें भाव में होने पर वाहन से गिरने पर बुरी दुर्घटना देते हैं. जन्म कुंडली में सूर्य तथा मंगल चतुर्थ भाव में पापी ग्रहों से दृष्ट होने पर दुर्घटना के योग बनते हैं. सूर्य दसवें भाव में और चतुर्थ भाव से मंगल की दृष्टि पड़ रही हो तब दुर्घटना होने के योग बनते हैं. निर्बली लग्नेश और अष्टमेश की चतुर्थ भाव में युति हो रही हो तब वाहन से दुर्घटना होने की संभावना बनती है. लग्नेश कमजोर हो और षष्ठेश, अष्टमेश व मंगल के साथ हो तब गंभीर दुर्घटना के योग बनते हैं. जन्म कुंडली में लग्नेश कमजोर होकर अष्टमेश के साथ छठे भाव में राहु, केतु या शनि के साथ स्थित होता है तब गंभीर रुप से दुर्घटनाग्रस्त होने के योग बनते हैं. 
   जन्म कुंडली में आत्मकारक ग्रह पापी ग्रहों की युति में हो या पापकर्तरी में हो तब दुर्घटना होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली का अष्टमेश सर्प द्रेष्काण में स्थित होने पर वाहन से दुर्घटना के योग बनते हैं. जन्म कुंडली में यदि सूर्य तथा बृहस्पति पीड़ित अवस्था में स्थित हों और इन दोनो का ही संबंध त्रिक भाव के स्वामियों से बन रहा हो तब वाहन दुर्घटना अथवा हवाई दुर्घटना होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली का चतुर्थ भाव तथा दशम भाव पीड़ित होने से व्यक्ति की गंभीर रुप से दुर्घटना होने की संभावना बनती है. 
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ऐसे बनते हैं घाव तथा चोट लगने के योग --- 
 यह मंगल की पीड़ित अवस्था के कारण होने की संभावना अधिक रहती है. जन्म कुंडली में यदि मंगल लग्न में हो और षष्ठेश भी लग्न में ही स्थित हो तब शरीर पर चोटादि लगने की संभावना अधिक होती है. जन्म कुंडली में मंगल पापी होकर आठवें या बारहवें भाव में स्थित होने पर चोट लगने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली में यदि मंगल, शनि और राहु की युति हो रही हो तब भी चोट अथवा घाव होने की संभावना बनती है. चंद्रमा दूसरे भाव में हो, मंगल चतुर्थ भाव में हो और सूर्य दसवें भाव में स्थित हो तब चोट लगने की संभावना बनती है. 
    जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव में सूर्य स्थित हो, आठवें भाव में शनि स्थित हो और दसवें भाव में चंद्रमा स्थित हो तब चोट लगने की अथवा घाव होने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली के छठे भाव में मंगल तथा चंद्रमा की युति हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती है. चंद्रमा तथा सूर्य जन्म कुंडली के तीसरे भाव में होने से भी चोट लगने की संभावना बनती है. कुंडली का लग्नेश तथा अष्टमेश शनि और राहु या केतु के साथ आठवें भाव में स्थित हो तब भी चोट लगने की संभावना बनती है. लग्नेश, चतुर्थेश तथा अष्टमेश की युति होने पर भी चोट लगने की संभावना बनती है. जन्म कुंडली के लग्न में ही छठे भाव का स्वामी राहु या केतु के साथ स्थित हो. जन्म कुंडली के छठे अथवा बारहवें स्थान में शनि व मंगल की युति हो रही हो. जन्म कुंडली के लग्न में पाप ग्रह हो या लग्नेश की पापी ग्रह से युति हो और मंगल दृष्ट कर रहा हो. 
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30 नवंबर 2017 से आएगी कमी--- 
 ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री का कहना है कि 30 नवंबर से इन मामलों में कुछ कमी आ सकती है क्योंकि मंगल कन्या राशि से हटकर तुला में प्रवेश करेगा। हालांकि बहुत ज्यादा फर्क तो नहीं, लेकिन दुर्घटनाओं के मामले में राहत जरूर मिलेगी। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इन उपायों से होगा लाभ-- यदि आपकी कुंडली में उपरोक्त ग्रहस्थितियां बन रही हैं या बार बार दुर्घटनाओं का सामना हो रहा है तो यह उपाय श्रद्धा से करें लाभ होगा। .. ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ग्रहों के इस मेल से बचने के लिए भगवान् हनुमान जी की आराधना करें। श्वान की सेवा करें। 
    ज्योतिष शास्त्र की मानें तो यह शनि की बुरी दृष्टि से बचने का सबसे सरलतम किंतु स्बासे ज्यादा प्रभावशाली उपाय है। सूर्य को जल दें और सूर्य गायत्री मंत्र का जाप करें। अधिक बेहतर है कि सूर्य गायत्री मंत्र से हवन करें। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि उपासना अवश्य करें। शनि के बीज मंत्र का कम से कम एक माला जाप करें (ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः)। इसके अलावा शनि उपवास कर सकते हैं, शनि चालीसा का पाठ कर सकते हैं और यदि संभव हो तो घर पर शनि शांति पाठ या शनि यज्ञ भी करवाया जाना फलदायी सिद्ध होगा। ये है मंत्र- ॐ भास्कराय विद्महे, महातेजाय धीमहि तन्नो सूर्य:प्रचोदयात्....
Edited by: Editor

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Editor In Chief : Dr. Umesh Sharma
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